Saturday, 10 December 2011

भगवती शांता परम सर्ग-5 : इति


चंपा-सोम
कई दिनों का सफ़र था, आये चंपा द्वार |
नाविक के विश्राम का, बटुक उठाये भार ||

राज महल शांता गई, माता ली लिपटाय |
मस्तक चूमी प्यार से, लेती रही बलाय ||

गई पिता के पास फिर, पिता रहे हरसाय |
स्वस्थ पिता को देखकर,फूली नहीं समाय ||

क्षण भर फिर विश्राम कर, गई सोम के कक्ष |
रूपा पर मिलती वहाँ, धक्-धक् करता वक्ष ||

गले सहेली मिल रही, पर आँखों में चोर |
सोम हमारे हैं कहाँ, अचरज होता  घोर ||

किन्तु सोम आये नहीं, की परतीक्षा खूब |
शांता शाळा को चलीं, सह रूपा के ऊब ||

शाला में स्वागत हुआ, मन प्रफुल्लित होय |
अपनी कृति को देखकर, जैसे साधक सोय ||

आत्रेयी आचार्या, गले लगाती आय |
बाला सब संकोच से, खुद को रहीं छुपाय ||

नव कन्याएं देखतीं, कौतूहल वश खूब |
सन्यासिन के वेश में, पूरी जाती ड़ूब ||

आनन्-फानन में जमे, सब उपवन में आय |
होती संध्या वंदना, रूपा कह समझाय ||

परिचय देवी का दिया, दिया ज्ञान का बार |
महाविकट दुर्भिक्ष से,  सबको  गई उबार || 

यह है अपनी शांता,  इनका  आशीर्वाद |
कन्या शाला चल पड़ी, गूंजा शुभ अनुनाद ||

पुत्तुल-पुष्पा थीं बनी, तीन वर्ष में मित्र |
मात-पिता के शोक में, स्थिति बड़ी विचित्र ||
ज़िंदा  है  माँ  जानता, इसका मिला सुबूत ।
आज पौत्र को पालती, पहले पाली पूत ।
पहले पाली पूत, हड्डियां घिसती जाएँ ।
करे काम निष्काम, जगत की सारी माएं ।
 किन्तु अनोखेलाल, कभी तो हो शर्मिन्दा ।
दे दे कुछ आराम, मान कर मैया ज़िंदा ।। 
कौला-सौजा राखती, कन्याओं का ध्यान |
पाक-कला सिखला रहीं, भाँति-भाँति पकवान ||

कामकाज  में  लीन  है,  सुध  अपनी विसराय |
उत्तम प्राकृत मनुज  की,  ईश्वर  सदा  सहाय ||

भले नागरिक वतन को, करते हैं खुशहाल |
बुरे   हमेशा   चाहते,  दंगे   क़त्ल    बवाल ||

दोनों बालाएं मिलीं, शांता ले लिपटाय |
आंसू पोंछे प्रेम से, रही शीश सहलाय ||

क्रीडा कक्षा का समय, बाला खेलें खेल |
घोड़ा आया सोम का, रूपा मिले अकेल ||

शांता को देखा वहां, आया झट से सोम |
छूता दीदी के चरण , दिल से कहता ॐ ||

चेहरे की गंभीरता,  देती इक सन्देश |
हलके में मत लीजिये, हैं ये चीज विशेष ||

दीदी अब घर को चलो, माता रही बुलाय |
कई लोग बैठे वहाँ,  काका  काकी आय ||

सौजा कौला मिल रहीं, रमणी है बेचैन |
दालिम काका भी मिले, आधी बीती रैन ||

नाव गाँव का कह रही, वो सारा वृतांत |
सौजा पूंछी बहुत कुछ, दालिम दीखे शांत ||
 
पर मन में हलचल मची, जन्मभूमि का प्यार |
 शाबाशी पाता बटुक, किया ग्राम उद्धार ||

रमणी से मिलकर करे, शांता बातें गूढ़ |
रूपा तो हुशियार है, बना सके के मूढ़ ||

अगले दिन रूपा करे, बैठी साज सिंगार |
जाने को उद्दत दिखे, बाहर राजकुमार ||

शांता आकर बैठती, करे ठिठोली लाग |
सखी हमारी जा रही, कहाँ लगाने आग ||

सुन्दरता को न लगे, बहना कोई दाग |
अपनी रक्षा खुद करे, रखे नियंत्रित राग ||

रूपा को न सोहता, असमय यह उपदेश |
आया अंग नरेश का, इतने में सन्देश ||

अजब गजब अंदाज है, बात करें चुपचाप ।
इक जगह पर हों खड़े, खुद की सुन पदचाप ।
 खुद की सुन पदचाप, गजब दीवानापन है ।
बारिश में ले भीग, प्रेम रस का आसन है ।
फिर मिलने की बात, आज मत करना भाई ।
सही जाय न आज, कहीं से यह रुसवाई ।।
रूपा को वो छोड़कर, गई पिता के पास |
चिंतित थोडा दीखते, चेहरा तनिक उदास ||

करें शिकायत सोम की, चंचलता इक दोष |
राज काज हित चाहिए, सदा सर्वदा होश ||

आयु मेरी बढ़ रही, शिथिल हो रहे अंग |
किन्तु सोम न सीखता, राज काज के ढंग ||

उडती-उडती इक खबर, करती है हैरान |
रूपा का सौन्दर्य ही, खड़े करे व्यवधान ||

हुआ राजमद सोम को, करना चाहे द्रोह |
रूपा मम पुत्री सरिस, रोकूँ कस अवरोह ||

तानाशाही सोम की, चलती अब तो खूब |
राजपुरुष जब निरंकुश, देश जाय तब डूब ||

मंत्री-परिषद् में अगर, रहें गुणी विद्वान |
राजा पर अंकुश रहे,  नहीं बने शैतान ||

पञ्च रतन का हो गठन, वही उठाये भार | 
करें सोम की वे मदद, करके उचित विचार ||

शांता कहती पिता से, दीजे उत्तर तात |
दे सकते क्या सोम को, रूपा का सौगात ||

करिए इनके व्याह फिर, चुनिए मंत्री पाँच |
महासचिव की आन पे, ना आवे पर आँच ||

सहमति में जैसे हिला, महाराज का शीश |
शांता की कम हो गयी, रूपा के प्रति रीस ||

उत्तर मिलता है कभी, कभी अलाय बलाय ।
प्रश्नों का अब क्या कहें, खड़े होंय मुंह बाय ।
खड़े होंय मुंह बाय, नहीं मन मोहन प्यारे ।
सब प्रश्नों पर मौन, चलें वैशाखी धारे ।
वैशाखी की धूम, लुत्फ़ लेता है रविकर ।
यूँ न प्रश्न उछाल, समय पर मिलते उत्तर ।।
तुरत बुलाया भूप ने,  आया जल्दी सोम |
दीदी पर पढ़ते नजर, रोमांचित से रोम ||

डुग्गी सारे देश में, एक बार बज जाय |
पांच रत्न चुनने हमें, कसके ठोक बजाय ||

राज कुंवर लेने लगे, जैसे लम्बी सांस |
दीदी की आई नहीं, अगली बातें रास ||

एक पाख में कर रहे, हम सब तेरा व्याह |
कह सकते हो है अगर, कोई अपनी चाह ||

पिता श्री क्यों कर रहे, इतनी जल्दी लग्न |
फिर रूपा के ख्याल में, हुआ अकेला मग्न ||

शुरू हुई तैयारियां, दालिम खुब हरसाय |
नेह निमंत्रण भेजते, सबको रहे बुलाय ||

रूपा तो घर में रहे, सोम उधर घबरात |
नींद गई चैना गया, रह रहकर अकुलात ||

टूटा दर्पण कर गया, अर्पण अपना स्नेह ।
बोझिल मन आँखे सजल, देखा कम्पित देह ।
देखा कम्पित देह, देखता रहता नियमित ।
होता हर दिन एक, दर्द नव जिस पर अंकित ।
कर पाता बर्दाश्त, नहीं वह काजल छूटा।
रूठा मन का चैन, और यह दर्पण टूटा ।। 

शादी के दो  दिन बचे, आये अवध-भुवाल |
कौशल्या के साथ में, राम लखन दोउ लाल ||

सृंगी तो आये नहीं, पहुंचे पर ऋषिराज |
पूर्ण कुशलता से हुआ, शादी का आगाज ||

जब हद से करने लगा, दर्द सोम का पार |
दीदी से जाकर मिला, विनती करे हजार ||
 
दीदी कहती सोम से, सुन ले मेरी बात |
शर्त दूसरी पूर कर, करे व्यर्थ संताप ||

मन की गाँठों से सदा, बढ़ता दुःख अवसाद ।
मन की गाँठे खोल दे, पाए मधुरिम स्वाद ।
पाए मधुरिम स्वाद, गाँठ का पूरा कोई ।
चले गाँठ-कट चाल, पकड़ के खुपड़ी रोई ।
रविकर लागे श्रेष्ठ, सदा ही गाँठ जोड़ना ।
अपना मतलब गाँठ, जानते दुष्ट छोड़ना ।। 
कौशल्या के पास फिर, गया सोम उस रात |
माता देखे  व्यग्रता, मन ही मन मुस्कात ||

जो मुश्किल में रख सके, मन में अपने धीर |
वही सोच सकता तनय, इक सच्ची तदवीर ||

कौला के जाकर छुओ, सादर दोनों पैर |
ध्यान रहे पर बात यह, जाओ मुकुट बगैर ||
 
उद्दत जैसे ही हुआ, झुका सामने सोम |
कौला पीछे हट गई, जैसे गिरता व्योम ||

अवधपुरी की रीत है, पूजुंगी कल पांव |
छूकर मेरे पैर को,  काहे पाप चढ़ाव ||

कन्याएं देवी सरिस, और जमाता मान |
पैर पूंज दे व्याह में, माता कन्यादान ||

हर्षित होकर के भगा, सीधे दीदी पास |
जैसे खोकर आ रहा, अपने होश-हवाश ||
नेह-निमंत्रण 
परसे  नैना  |
जन्म-जन्म के 
करषे  नैना | |  

प्रियतम को अब
तरसे    नैना  |
कितने  लम्बे-
अरसे   नैना ||

हौले  -  हौले 
बरसे    नैना |
जाते अब तो 
मर से  नैना  ||

अब आये क्यूँ   
घर  से  नैना |
जरा जोर से 
हरसे  नैना ||
दीदी के छूकर चरण, घुसता अपने कक्ष |
हर्षित होकर नाचता, जाना कन्या पक्ष ||

बहन-नारि-गुरु-सखी बन, करे पूर्ण सद्कर्म |
भाव समर्पण का सदा, बनता जीवन-धर्म ||

रानी सन्यासिन बने, दासी राजकुमारि |
जीती हर किरदार खुश, नारी विगत बिसारि ||

नारी सबल समर्थ है, कितने बदले रूप |
सामन्जस बैठाय ले, लगे छांह या धूप ||

शारीरिक शक्ति तनिक, नारी नर से क्षीन |
अंतर-मन मजबूत तन, सहनशक्ति परवीन ||

पञ्च-रत्न 
शादी होती सोम से, शांता का आभार |
कौला दालिम खुश हुए, पाती रूपा प्यार ||
चाहत की कीमत मिली, अहा हाय हतभाग ।
इक चितवन देती चुका, तड़पूं अब दिन रात ।

तड़पूं अब दिन रात,  आँख पर आंसू छाये ।

दिल में यह तश्वीर, गजब हलचलें मचाये ।

देती कंटक बोझ, इसी से पाई राहत । 

कर्म कर गई सोझ, कोंच के नोचूं चाहत ।।
समाचार लेते रहे, शांता सृंगी व्यस्त  |
दुरानुभूती माध्यम, सूर्यदेव जब अस्त ||

परम बटुक को मिल रहा, राजवैद्य का नेह |
साधक आयुर्वेद का, करता अर्पित देह ||
कविता कर कर के करे, कवि कुल आत्मोत्थान ।
जैसे योगी तन्मयी, करे ईश का ध्यान ।
करे ईश का ध्यान, शान में पढ़े कसीदे ।
भावों में ले ढाल, ढाल से  सौ उम्मीदें  ।
रोके तेज कटार, व्यंग वाणों को रविकर ।
कायम रख ईमान, हमेशा कविता कर कर ।।
कौशल्या उत्सुक बड़ी, कन्याशाला घूम |
मन को हर्षित कर गई, बालाओं की धूम ||

गोदी की इक बालिका, आकर करे कमाल |
संस्कारित शिक्षित करे, दो सौ ललना पाल ||

हर बाला इक वंश है, फूले-फले विशाल |
होवे देवी मालिनी,  हरी भरी हर डाल ||

शाळा को हर एक वर्ष, सौ पण का अनुदान |
कौशल्या कहकर चली, बिटिया बड़ी महान ||

राम-लखन के साथ में, शांता समय बिताय |
दूल्हा-दुल्हन की डगर, हक़ से छेके जाय ||

स्वर्णाभूषण त्याग दी,  आडम्बर सब त्याग |
भौतिकता से  है  नहीं,  दीदी  को  अनुराग ||

दीदी बोली कीजिये, शर्त दूसरी पूर |
शाळा हरदिन जायगी, रूपा सखी जरूर ||

जिम्मेदारी दीजिये, खींचों नहीं लकीर  |
नारी में शक्ती बड़ी, बदल सके तक़दीर ||

कन्याएं दो सौ वहां, अभिभावक दो एक |
शाला की चिंता हरे, रूपा मेरी नेक ||

बना व्यवस्था चल पड़ी, वह शाळा की ओर |
आत्रेयी को सौंपती, पञ्च-रत्न की डोर ||

आचार्या करने लगी, प्रश्न-पत्र तैयार |
कई चरण की जाँच से, होना होगा पार ||

नियत तिथि पर आ रहे, लेकर सब उम्मीद |
कन्याशाला में टिके,  पढ़ उद्धृत-ताकीद ||

पहला दिन आराम का, हुई ना कोई जाँच |
नगर भ्रमण कोई करे, कोई पुस्तक बाँच ||

कोई बैठा बाग़ में, कोई गंगा तीर |
खेल करे मैदान में, कई सयाने वीर ||

मिताहार कोई वहां, मिताचार से प्यार |
कुछ तो भोजन भट्ट हैं, और कई लठमार ||

सूची इक जारी हुई, बाइस वापस जाव |
बाकी इक्कावन बचे, काया जाँच कराव ||

तेरह इसमें छट गए, अड़तिस गंगा तीर |
डूबी पानी में उधर, ग्यारह की तकदीर ||

सत्ताईस की लेखनी, बाइस हों उत्तीर्ण |
पाँच जनों के हो रहे, ऐसे भाग-विदीर्ण ||

राज महल में मिल गया, सबको एकल कक्ष |
अपने अपने विषय में, थे ये पूरे दक्ष ||

बाइस पहले जो छटे, शाला के प्रति द्वेष |
शिक्षा के प्रति थी नहीं, उनमें रुची विशेष ||

राजकाज के काम दो, दिए एक से जाँय |
तीन दिनों में एक को, आओ सब निपटाय ||

प्रतिवेदन प्रस्तुत करो, लिखकर वापस आय |
एक परीक्षा बचेगी, तेरह  को  बिलगाय ||

गुप्तचरों की सूचना, वा प्रस्तुत आलेख |
महामंत्री ने चुने, प्रतिभागी नौ  देख ||

अगले दिन दरबार में, बैठे अंग नरेश |
नौ के नौ आयें वहां, धर दरबारी भेष ||

साहस संयम शिष्टता, अनुकम्पा औदार्य |
मितव्ययी निर्बोधता, न्याय-पूर्ण सद्कार्य ||

क्षमाशीलता सादगी, सहिष्णुता गंभीर |
सच्चाई प्रफुल्लता, निष्कपटी मन धीर ||

स्वस्ती मेधा शुद्धता, हो चारित्रिक ऐक्य |
दानशीलता आस्तिक, अग्र-विचारी शैक्य ||

सर्वगुणी सब विधि भले, सब के सब उत्कृष्ट |
अंगदेश को गर्व है, गर्व करे यह सृष्ट ||

जाँच-परखकर कर रहे, सबको यहाँ नियुक्त |
एक वर्ष के बाद में, होंय चार जन मुक्त ||

तीन मास बीते यहाँ, आया फिर वैशाख |
शांता सृन्गेश्वर चली, मन में धीरज राख ||

कन्याओं से मिल लिया, पुष्पा-पुत्तुल पास |
रमणी को देकर चली, एक हिदायत ख़ास ||

 बटुक रमण फिर से चला, दीदी को ले साथ |
शिक्षा विधिवत फिर करे, जय हो भोले नाथ ||

आश्रम की रौनक बढ़ी, सास-ससुर खुश होंय |
सृंगी अपने शोध में, रहते  हरदम खोय ||

शांता सेवा में जुटी, परम्परा निर्वाह |
करे रसोईं चौकसी, भोजन की परवाह ||

शिष्य सभी भोजन करें, पावें नित मिष्ठान |
करें परिश्रम वर्ग में, नित-प्रति बाढ़े ज्ञान ||

वर्षा-ऋतु में पूजती, कोसी को धर ध्यान |
सृन्गेश्वर की कृपा से, उपजे बढ़िया धान ||

शांता की बदली इधर, पहले वाली चाल |
धीरे धीरे पग धरे, चलती बड़ा संभाल ||

खान-पान में हो रहा, थोडा सा बदलाव |
खट्टी चीजें भा रहीं,  बदल गए अब चाव ||

सासू माँ रखने लगीं, अपनी दृष्टी तेज |
प्रफुल्लित माता रखे,  चीजें सभी सहेज ||

पुत्री सुन्दर जन्मती, बाजे आश्रम थाल |
सेवा सुश्रुषा करे, पोसे बहुत संभाल ||

तीन वर्ष पूरे हुए, शिक्षा पूरी होय |
दीदी से मिलकर चले, बटुक अंग फिर रोय || 

फिर पूरे परिवार से, करके नेक सलाह |
माँ दादी को साथ ले, पकड़ें घर की राह || 

आश्रम इक सुन्दर बना, करते हैं उपचार |
साधुवाद है वैद्य जी, बहुत बहुत आभार ||

तीन वर्ष बीते इधर, मिला राज सन्देश |
वैद्यराज का रिक्त पद, तेरे लिए विशेष ||
 
क्षमा-प्रार्थना कर बचे, नहीं छोड़ते ग्राम |
आश्रम फिर चलता रहा, प्रेम सहित अविराम ||

रक्षाबंधन पर मिली, शांता घर पर आय |
भागिनेय दो गोद में, दीदी रही खेलाय ||

पुत्तुल के संग वो रखी, पाणिग्रहण प्रस्ताव |
मेरी सहमति है सदा, पुत्तुल की बतलाव ||

शांता लेकर बटुक को, चम्पानगरी जाय |
पुत्तुल के इनकार पर, रही उसे समझाय ||
 
नश्वर जीवन कर दिया, इस शाळा के नाम |
बस नारी उत्थान हित, करना मुझको काम ||

पुष्पा से एकांत में, मिलती शांता जाय |
वैद्य बटुक से व्याह हित, मांगी उसकी राय ||

शरमाई बाहर भगी, मिला मूल संकेत |
मंदिर में शादी हुई, घरवाला अनिकेत ||

रूपा से मिलकर हुई दीदी बड़ी प्रसन्न |
गोदी में इक खेलता, दूजा है आसन्न ||

पञ्च रत्न की सब कथा, पूछी फिर चितलाय |
डरकर नकली असुर से, भाग चार जन जाँय ||

पञ्च-रतन को एक दिन, दे अभिमंत्रित धान | 
खेती करने को कहा, देकर पञ्च-स्थान ||

बढ़िया उत्पादन हुआ, मन सा निर्मल भात |
खाने में स्वादिष्टतम, हुआ न कोई घात ||


राज काज मिल देखते, पंचरत्न सह सोम |
महासचिव का साथ है, कुछ भी ना प्रतिलोम ||


पिताश्री ने एक दिन, सबको लिया बुलाय |
पंचरत्न में चाहिए, स्वामिभक्त अधिकाय ||


चाटुकारिता से बचो, इंगित करिए भूल |
राजधर्म का है यही, सबसे बड़ा उसूल ||

औरन की फुल्ली लखैं , आपन  ढेंढर  नाय
ऐसे   मानुष   ढेर  हैं,   चलिए  सदा  बराय||

निर्बुद्धि की जिन्दगी, सुख-दुःख से अन्जान |
निर्बाधित जीवन जिए,  डाले  न व्यवधान  ||

बुद्धिवादी परिश्रमी,  पाले  घर  परिवार |
मूंछे  ऐठें  रुवाब से,  बैठे  पैर  पसार  ||

बुद्धिजीवी  का  बड़ा, रोचक  है  अन्दाज |
जिभ्या ही करती रहे, राज काज आवाज ||

बुद्धियोगी  हृदय  से,  लेकर  चले समाज |
करे भलाई जगत का, दुर्लभ हैं पर आज ||
लेकर सेवा भावना, देखो भाग विभाग |
पैदा करने में लगो, जनमन में अनुराग ||

मात-पिता से पूछ के, कुशल क्षेम हालात |
संतुष्टि पाती वहां, शांता वापस जात ||


कुशल व्यवस्थापक बनी, हुई भगवती माय |
पाली नौ - नौ  पुत्रियाँ,  आठो  पुत्र पढाय ||


एक से बढ़कर एक थे, संतति सब गुणवान |
शोध भाष्य करते रहे, पढ़ते वेद - पुरान ||

वैज्ञानिक वे श्रेष्ठ सब, मन्त्रों पर अधिकार |
अपने अपने ढंग से, सुखी करें संसार ||


सास-ससुर सब सौंप के, गए देव अस्थान |
राजकाज सब साध के, देकर के वरदान ||

वन खंडेश्वर को गए, बिबंडक महराज |
भिंड आश्रम को सजा, करे वहां प्रभु-काज ||

आठ पौत्रों से मिले, सब है बेद-प्रवीन |
बड़े भिंड के हो गए, आश्रम में आसीन ||
 
सौंपें सारे ज्ञान को, बाबा बड़े महान |
स्वर्ग-लोक जाकर बसे, छोड़ा यह अस्थान ||

भिन्डी ऋषि के रूप में, हुए विश्व विख्यात |
सात राज्य में जा बसे, पौत्र बचे जो सात ||

Trees in front of under ground Temple, Shringi Rishi

एक अवध में जा बसे, सरयू तट के पास |
बरुआ सागर आ गया, एक पुत्र को रास ||

विदिशा जाकर बस गए, सबसे छोटे पूत |
पुष्कर की शोभा बढ़ी, बाढ़ा वंश अकूत ||




आगे जाकर यह हुए, छत्तीस कुल सिंगार |
छ-न्याती भाई यहाँ, अतुलनीय विस्तार ||


बसे हिमालय तलहटी, चौरासी सद्ग्राम |
वंशज सृंगी के यहाँ, रहते हैं अविराम ||

सृंगी दक्षिण में गए, पर्वत बना निवास |
ज्ञान बाँट करते रहे, रही शांता पास ||

वंश-बेल बढती रही, तरह तरह के रूप |
कहीं मनीषी बन रमे, हुए कहीं के भूप ||


मंत्रो की शक्ती प्रबल, तंत्रों पर अधिकार |
कलियुग के प्रारब्ध तक, करे वंश व्यवहार ||


हुए परीक्षित जब भ्रमित, कलियुग का संत्रास |
स्वर्ण-मुकुट में जा घुसा, करता बुद्धी नाश  ||


सरिता तट पर एक दिन, लौटे कर आखेट |
लोमस ऋषि से हो गई, भूपति की जब भेंट ||


बैठ समाधि में रहे, राजा समझा धूर्त |
मरा सर्प डाला गले, जैसे शंकर मूर्त ||



वंशज देखें सृंग के, भर अँजुरी में नीर |
मन्त्रों से लिखते भये, सात दिनों की पीर ||


यही सर्प काटे तुम्हें, दिन गिनिये अब सात |
गिरे राजसी कर्म से, सहो मृत्यु आघात ||


मन्त्रों की इस शक्ति का, था राजा को भान |
लोमस के पैरों पड़ा, वह राजा नादान ||
 i

लेकिन भगवत-पाठ सुन, त्यागा राजा प्रान |
यह पावन चर्चित कथा, जाने सकल जहान ||


जय जय भगवती शांता परम

Monday, 5 December 2011

भगवती शांता परम सर्ग-4 : भार्या शांता



कौशिकी-कोसी 
सृन्गेश्वर महादेव

भगिनी विश्वामित्र की, सत्यवती था नाम |
षोडश सुन्दर रूपसी, हुई रिचिक की बाम ||


दुनिया का पहला हुआ, यह बेमेल विवाह |

बुड्ढा खूसट ना करे, पत्नी की परवाह || 


वाणी अति वाचाल थी, हुआ शीघ्र बेकाम |

दो वर्षों में चल बसा, बची अकेली बाम ||


सत्यवती पीछे गई, स्वर्ग-लोक के द्वार |

कोसी बन क्रोधित हुई, होवे हाहाकार ||


उच्च हिमालय से निकल, त्रिविष्टक को पार |

अंगदेश की भूमि तक, है इसका विस्तार ||


असंतुष्ट सी बह रही, नहीं तनिक भी बोध |

जल-प्लावित करती रहे, जब - तब  आवे क्रोध ||


अंगदेश का शोक है, रूप बड़ा विकराल |

ग्राम सैकड़ों लीलती, काल बजावे गाल ||


धरती पर लाती रही, बड़े गाद भण्डार |

गंगा जी में जा मिले, शिव का
कर आभार ||

इसी भूमि पर कर रहे, ऋषि अभिनव प्रयोग |

ऋषि विविन्डक  हैं यही, विनती करते लोग ||


उन्हें पराविज्ञान का, था अद्भुत अभ्यास |

मन्त्रों की शक्ति प्रबल, सफल सकल प्रयास ||




निश्छल  और  विनम्र  है, मंद-मंद मुस्कान |
मितभाषी मृदु-छंद है, उनका हर व्याख्यान ||

अभिव्यक्ति रोचक लगे, जागे मन विश्वास |  
बाल-वृद्ध-युवजन जुड़े, आस छुवे आकाश ||

दूरदर्शिता  का उन्हें,  है अच्छा अभ्यास |
जोखिम से डरते नहीं, नहीं अन्धविश्वास ||

इन्ही विविन्डक  ने दिया, था दशरथ को ज्ञान |
शांता को दे दीजिये, गोद किसी की दान ||

सृंगी ऋषि,  कुल्लू घाटी
ऋषि विविन्ड़क का प्रबल, परम प्रतापी पूत |

कुल्लू घाटी में पड़े, अब भी कई सुबूत ||


जेठ मास में आज भी, सजा पालकी दैव |

करते इनकी वंदना, सारे वैष्णव शैव ||


लकड़ी का मंदिर बना, कलयुग के महराज |

 कल के सृंगी ही बने, देव-स्कर्नी आज ||

अट्ठारह करदू हुवे, उनमे से हैं एक |

कुल्लू घाटी विचरते, यात्रा करें अनेक ||


हमता डौरा-लांब्ती, रक्ती-सर गढ़-धोल |

डौरा कोठी पञ्च है, मालाना तक डोल ||


छ सौ तक हैं पालकी, कहते हैं रथ लोग |

सृंगी से आकर मिलें, सूखे का जब योग ||


मंत्रो पर अद्भुत पकड़, करके वर्षों शोध |


वैज्ञानिक अति श्रेष्ठ ये, मिला पिता से बोध ||
File:Water inside shringi rishi cave.JPG
गुफा में पानी -नाहन 
नाहन के ही पास है, गुफा एक सिरमौर |
जप-तप करते शोध इत, जब सूखे के दौर ||


सृन्गेश्वर की थापना, कम कोसी का कोप |

सृंगी ऋषि ने था किया, भूमि शिवा को सौंप ||


सात पोखरों की धरा, सातोखर है नाम |
शोध कार्य होते यहाँ, पुत्र-काम का धाम ||
 

अंगदेश का क्षेत्र यह, महिमामय अस्थान |

शांता-रूपा साथ माँ, आती करय परनाम ||
शांता और रिस्य-सृंग 
शांता थी गमगीन, खोकर काका को भली |
मौका मिला हसीन, लौटी चेहरे पर हंसी ||

सबने की तारीफ़, वीर रमण के दाँव की  | 
सहा बड़ी तकलीफ, मगर बचाई जान सब ||

राजा रानी आय, हालचाल लेकर गए |
करके सफल उपाय, वैद्य ठीक करते उसे ||

हुआ रमण का व्याह, नई नवेली दुल्हनी |
पूरी होती चाह, महल एक सुन्दर मिला ||


नीति-नियम से युक्त, जिये  जिन्दगी धीर धर |
हंसे  ठठा उन्मुक्त, परहितकारी कर्म शुभ || 

रहते दोनों भाय, माता बच्चे साथ में |
खुशियाँ पूरी छाय, पाले जग की परंपरा ||

मनसा रहा बनाय, रमण एक सप्ताह से |
सृन्गेश्वर को जाय, खोजे रहबर साधु को ||

शांता जानी बात, रूपा संग तैयार हो |
माँ को नहीं सुहात, कौला  सौजा भी चलीं ||

दो रथ में सब बैठ, घोड़े भी संग में चले |
रही  शांता  ऐंठ, मेला  पूरा जो लगा ||

रही सोम को देख, चंपा बेटे से मिलीं |
मूंछों  की आरेख, बेटे की  लागे भली ||

बेटा  भी तैयार, महादेव के दर्श हित |
होता अश्व सवार, धीरे से निकले सभी ||

 नौकर-चाकर भेज, आगे आगे जा रहे |
 इंतजाम में तेज, सभी जरूरत पूरते ||

पहुंचे संध्या काल, सृन्गेश्वर को नमन कर |
डेरा देते डाल, अगले दिन दर्शन करें ||

सुबह-सुबह अस्नान,  सप्त-पोखरों में करें |
पूजक का सम्मान, पहला शांता को मिला ||

कमर बांध तलवार, बटुक परम भी था खड़ा |

सन्यासी को देखते, लगा इन्हें हुस्कारने ||

रूपा शांता संग, गप्पें सीढ़ी पर करे |
हुई देखकर दंग, रिस्य सृंग को सामने ||

तरुण ऊर्जा-स्रोत्र, वल्कल शोभित हो रहा |
अग्नि जले ज्यों होत्र, पावन समिधा सी हुई ||

गई शांता झेंप, चितवन चंचल फिर चढ़ी |
मस्तक चन्दन लेप, शीतलता महसूस की ||

ऋषिवर को परनाम, रूपा बोली हृदय से |
शांता इनका नाम, राजकुमारी अंग की ||

हाथ जोड़कर ठाढ़, हुई शांता फिर मगन |
वैचारिक यह बाढ़, वापस भागी शिविर में ||

पूजा लम्बी होय, रानी चंपा की इधर |
शिव को रही भिगोय, दुग्ध चढ़ाये विल्व पत्र ||

रमण रहे थे खोज, मिले नहीं वे साधु जी |
था दुपहर में भोज, विविन्डक आये  शिविर ||

गया चरण में लोट, रमण देखते ही उन्हें |
मिटते उसके खोट, जैसे घूमें स्वर्ग में ||

बोला सबने ॐ, भोजन की पंगत सजी |
बैठा साथे सोम, विविन्डक ऋषिराज के ||

संध्या  सारे जाँय, कोसी की पूजा करें |
शांता रही घुमाय, रूपा को ले साथ में ||

अति सुन्दर उद्यान, रंग-विरंगे पुष्प हैं |
सृंगी से अनजान, चर्चा करने लग पड़ीं ||
तरह तरह के प्रेम हैं, अपना अपना राग |
मन का कोमल भाव है, जैसे जाये जाग |


जैसे जाये जाग, वस्तु वस्तुता नदारद |
पर बाकी सहभाग, पार कर जाए सरहद |


जड़ चेतन अवलोक, कहीं आलौकिक पावें |
लुटा रहे अविराम, लूट जैसे मन भावे |
लगते राजकुमार, सन्यासी बन कर रहें ||
करके देख विचार, दाढ़ी लगती है बुरी ||

खट-पट करे खिडाव, देख सामने हैं खड़े |
छोड़-छाड़ वह ठाँव, रूपा सरपट भागती ||

शांता शान्ति छोड़, असमंजस में जा पड़ी |
जिभ्या चुप्पी तोड़, करती है प्रणाम फिर ||

मैं सृंगी हूँ जान, ऋषी राज के पुत्र को |
करता अनुसंधान, गुणसूत्रों के योग पर ||

मन्त्रों का व्यवहार, जगह जगह बदला करे |
सब वेदों का सार, पुस्तक में संग्रह करूँ ||

पिता बड़े विद्वान, मिले विरासत में मुझे |
उनके अनुसंधान, जिम्मेदारी है बड़ी ||

कर शरीर का ख्याल, अगर सवारूँ रात दिन |
पूरे  कौन  सवाल, दुनिया के फिर करेगा ||

बदले दृष्टिकोण, रिस्य सृंग का प्रवचन |
बाहें रही मरोड़, हाथ जोड़ प्रणाम कर ||

लौटी रूपा देख, बढे सृंग आश्रम गए | 
अपनी जीवन रेख, शांता देखे ध्यान से ||

लौट शिविर में आय, अपने बिस्तर पर पड़ी |
कर कोशिश विसराय, सृंगी मुख भूले नहीं ||
शांता का सन्देश 
सृन्गेश्वर से आय के, हुई जरा चैतन्य |
छोड़ विषय को सोचने, लगी शांता अन्य ||
तिनका मुँह में दाब के, मुँह में उनका नाम ।
सौ जोजन का सफ़र कर, पहुंचाती पैगाम ।
पहुंचाती पैगाम, प्रेम में पागल प्यासी ।
सावन की ये बूंद, बढाए प्यास उदासी ।
पंछी यह चैतन्य, किन्तु तन को न ताके ।
यह दारुण पर्जन्य, सताते जब तब आके ।।
रिश्तों   की   पूंजी  बड़ी , हर-पल संयम वर्त |  
पूर्ण-वृत्त   पेटक  रहे ,  असली  सुख   संवर्त ||

सोम हुवे युवराज जब, उसको आया ख्याल ||
बिना पुत्र के है बुरा, अवध राज का हाल ||

गुरु वशिष्ठ को भेजती, अपना इक सन्देश |
तीव्रगति से पहुँचता, शांता  दूत  विशेष ||

रिस्य सृंग के शोध का, था  उसमें उल्लेख | 
गुरु वशिष्ठ हर्षित हुए, विषयवस्तु को देख ||

चितित दशरथ को बुला, बोले गुरू वशिष्ठ ||
हर्षित दशरथ कर रहे, कार्य सभी निर्दिष्ट ||

तैयारी पूरी हुई, रथ को रहे उडाय |
रिस्य सृंग के सामने, झोली को फैलाय ||

हमको ऋषिवर दीजिये, अब अपना आशीष |
चरणों में हैं लोटते, पटके अपना शीश ||

राजन धीरज धारिये, काहे होत अधीर |
सृन्गेश्वर को पूजिये, वही हरेंगे पीर ||

मैं तो साधक मात्र हूँ, शंकर ही हैं सिद्ध |
दोनों हाथों से पकड़, बोले उठिए वृद्ध ||

सात दिनों तक आपकी, करूँगा पूरी जाँच |
सृन्गेश्वर के सामने, शिव पुराण नित बाँच ||

सात दिनों का तप प्रबल, औषधिमय खाद्यान |
दशरथ पाते पुष्टता, मिटे सभी व्यवधान ||

सूची इक लम्बी लिखी,  सृंगी देते सौंप ||
बुड्ढी काया में दिखी, तरुणों जैसी चौप ||

कुछ प्रायोगिक कार्य हैं, कोसी की भी बाढ़ |
इंतजाम करके रखो,  आऊं माह असाढ़||

ख़ुशी-ख़ुशी दशरथ गए, रौनक रही बताय | 
देरी के कारण उधर, रानी सब उकताय ||

अवधपुरी के पूर्व में, आठ कोस पर एक |
बहुत बड़े भू-खंड पर, लागे लोग अनेक ||

सुन्दर मठ-मंदिर बना, पोखर बना विशेष |
हवन कुंड भी सज रहा, पहुंचा सारा देश ||

थी अषाढ़ की पूर्णिमा, पुत्र-काम का यग्य |
सुमिर गजानन को करें, रिस्य सृंग से विज्ञ ||

शांता भी आई वहां, रही व्यवस्था देख |
फुर्सत में थी बाँचती, सृंगी के अभिलेख ||


 समझे न जब भाष्य को, बिषय तनिक गंभीर |
फुर्सत मिलते ही मिलें, सृंगी सरयू तीर ||




देखें जब अभ्यासरत, रिस्य रिसर्चर रोज |

नए-नए सिद्धांत को, प्रेषित करते खोज ||



प्रेम प्रस्फुटित कब हुआ, जाने न रिस्य सृंग |
वहीँ किनारे भटकता, प्रेम-पुष्प पर भृंग ||

कई दिनों तक यग्य में, रहे व्यस्त सब लोग |
नए चन्द्र दर्शन हुए, आया फिर संयोग ||

पूर्णाहुति के बाद में, अग्नि देवता आय |
दशरथ के शुभ हाथ में, रहे खीर पकडाय ||

दशरथ ग्रहण कर रहे, कहें बहुत आभार |
आसमान में देवता, करते जय जयकार ||

कौशल्या करती ग्रहण, आधी पावन खीर |
कैकेयी भी ले रही, होकर बड़ी अधीर ||

दोनों रानी ने दिया, आधा आधा भाग |
रहा सुमित्रा से उन्हें, अमिय प्रेम अनुराग ||

चैत्र शुक्ल नवमी तिथी, प्रगट हुवे श्री राम |
रही दुपहरी खुब भली, तनिक शीत का घाम ||

गोत्र दोष को काटते, रिस्य सृंग के मन्त्र |
कौशल्या सुदृढ़ करे, अपना रक्षा तंत्र ||

कैकेयी के भरत भे, हुई मंथरा मग्न |
हुवे सुमित्रा के युगल,लखन और शत्रुघ्न ||

लंका में रावण उधर, जीत विश्व बरबंड |
मानव को जोड़े नहीं, बाढ़ा बहुत घमंड ||


देव यक्ष गन्धर्व को, जीता हुआ मदांध |
 स्वर्ग जीत के टाँगता, यम को उल्टा बाँध ||

नर-वानर बूझे नहीं, माने कीट पतंग | 
अनदेखी करने लगा, करे विश्व बदरंग ||

अंग अंग लेकर विकल, गई शांता अंग |
और इधर रिस्य सृंग की, शोध कर रही भंग ||

कौशल्या कन्या पाठशाला 
अंगराज के स्वास्थ्य को, ढीला-ढाला पाय |
चम्पारानी की ख़ुशी, सारी गई बिलाय ||

शिक्षा पूरी कर चुके, अपने राजकुमार |
अस्त्र-शस्त्र सब शास्त्र में, पाया ज्ञान अपार ||

व्यवहार-कुशल नीतिज्ञ, वय अट्ठारह साल |
राजा चाहें सोम से, पद युवराज सँभाल ||

शांता आगे बढ़ करे, सारे मंगल कार्य |
बटुक परम साथे लगा, सेवे वह आचार्य ||

गुरुजन के सानिध्य में, उसको होता बोध |
दीदी से कहने लगा, दूर करें अवरोध ||

प्रारम्भिक शिक्षा हुई, थी शांता के संग |
पूरी शिक्षा के बिना, मानव रहे अपंग ||

सुनकर के अच्छा लगा,  देती आशीर्वाद |
सृन्गेश्वर भेजूं  तुझे, समारोप के बाद ||

आया उसको ख्याल इक, रखी बाँध के गाँठ |
कन्याशाला से बढ़ें, अंगदेश  के ठाठ ||

सोम बने युवराज तो, आया श्रावण मास |
सूत्र बाँधती भ्रात कर, बहनों का दिन ख़ास ||

आई श्रावण पूर्णिमा,  सूत्र बटुक को बाँध |
गई सोम को बाँधने, मन में निश्चित साँध ||
विवरण मनभावन लगा, सावन दगा अबूझ |
नाटक नौटंकी ख़तम, ख़तम पुरानी सूझ |
ख़तम पुरानी सूझ, उलझ कर जिए जिंदगी |
अपने घर सब कैद, ख़तम अब दुआ बंदगी |
गुड़िया झूला ख़त्म, बची है राखी बहना |
मेंहदी भी बस रस्म, अभी तक गर्मी सहना ||
राज महल में यह प्रथम,  रक्षा बंधन पर्व |
सोम बने युवराज हैं, होय बहन को गर्व ||

चम्पारानी थी खड़ी, ले आँखों में प्यार |
शांता अपने भ्रातृ की, आरति रही उतार ||

रक्षाबंधन बाँध के, शांता बोली भाय |
मोती-माणिक राखिये, यह सब नहीं सुहाय ||

दीदी खातिर क्या करूँ, पूँछें जब युवराज |
कन्या-शाला दीजिये, सिद्ध कीजिये काज ||

बोले यह संभव नहीं, यह शिक्षा बेकार |
पढ़कर कन्या क्या करे, पाले-पोसे नार ||

कन्याएं बेकार में,  समय करेंगी व्यर्थ  ||
गृह कार्य सिखलाइये, शिक्षा का क्या अर्थ ||

माता ने झटपट किया, उनमे बीचबचाव  |
शिक्षित नारी से सधे, देश नगर घर गाँव ||

वेदों के विपरीत है, नारी शिक्षा बोल |
उद्दत होते सोम्पद, शालाएं मत खोल ||

बोली मैंने भी पढ़ी, शांता कर प्रतिवाद |
वेद-भाष्य रिस्य सृंग का, कोई नहीं विवाद ||

गौशाला को हम चले,  बाकी काम अनेक |
श्रावण बीता जाय पर, हुई न वर्षा एक ||

त्राहि-त्राहि परजा करे, आया अंग अकाल |
खेत धान के सूखते, ठाढ़े कई सवाल ||

भीषण गर्मी से थका, मन-चंचल तन-तेज |
भीग पसीने से रही, मानसून अब भेज |


मानसून अब भेज, धरा धारे जल-धारा |
जीव-जंतु अकुलान, सरस कर सहज सहारा |


पद के सुन्दर भाव, दिखाओ प्रभु जी नरमी |
यह तीखी सी धूप, थामिए भीषण गरमी ||
धीरे धीरे सावन आये। समय हमेशा अधिक लगाये ।
व्याकुल जीवन तपती धरती । नाजुक विटप लताएँ मरती ।।
कुदरत अब सिंगार करे है । मस्तक पर नव मुकुट धरे है ।
नव पल्लव संबल पाते हैं । लिपट चिपट कर चढ़ जाते हैं ।।

हरियाली सब का मन मोहे ।  रविकर दिनभर भटके-टोहे ।
मेघ गर्जना बिजली दमकी । कविवर क्यूँ आँखें न चमकी ??
गौशाला में आ रहा, बेबस गोधन खूब |
पानी जो बरसा नहीं, जाए जन मन ऊब ||
सूखे के आसार हैं, बही नहीं जलधार ।
हैं अषाढ़ सावन गए, कर भादौं उपकार ।।
मन का पंछी दूर तक, उड़ उड़ वापस आय ।
सावन की मनहर छटा, फिर भी मन तड़पाय ।
फिर भी मन तड़पाय, साथ यादें ही आती ।
सुन लो तुम चितलाय, झूल सावन जो गाती ।
भीगे भीगे शब्द, करे हैं ठेलिमठेला ।
रहा अधर में झूल, भीगता नहीं अकेला ।।
दूर दूर से आ रहे, गंगाजी के तीर ||
देखों उनकी दुर्दशा, करत घाव गंभीर ||

छोड़े अपने बैल सब, गाय देत गौशाल |
जोहर पोखर सूखते, बाढ़ा बड़ा बवाल ||
गरज हमारी देख के,  गरज-गरज घन खूब ।
बिन बरसे वापस हुवे, धमा-चौकड़ी ऊब ।
 
धमा-चौकड़ी ऊब, खेत-खलिहान तपे हैं ।
तपते सड़क मकान, जीव भगवान् जपे है ।

त्राहिमाम हे राम, पसीना छूटे भारी ।
भीगे ना अरमान, भीगती देह हमारी ।। 
सब शिविरों में आ रहे, होता खाली कोष |
कन्या शाला के लिए, मत दे बहना दोष ||

इतने में दालिम दिखा, बोला जय युवराज |
मंत्री-परिषद् बैठती, कुछ आवश्यक काज ||

पढ़ चेहरे के भाव को, दालिम समझा बात ||
शांता बिटिया है दुखी, दुखी दीखती मात ||

दालिम से कहने लगी, परम बटुक की चाह |
पढने की इच्छा प्रबल, दीजे तनिक सलाह ||

जोड़-घटाना जानता, जाने वह इतिहास |
वह भी तो सेवक बने, मात-पिता जब दास ||

लगी कलेजे में यही,  उतरी गहरे जाय |
सोचें न उत्कर्ष की, शांता कस समझाय ||

दुखते दिल से पूछती, अच्छा कहिये तात |
राजमहल के चार कक्ष, इधर कहाँ इफरात ||

चम्पा-रानी भी कहें, हाँ दालिम हाँ बोल |
कन्या-शाला को सके, जिसमें बिटिया खोल ||

हाथ जोड़ करके कहे,  यहाँ नहीं अस्थान |
महल हमारा है बड़ा, मिला हमें जो दान ||

शांता उछली जोर से, हर्षित निकले चीख |
कन्या-शाला के लिए, मांगे शांता भीख ||

शर्मिंदा क्यूँ कर रहीं, हमको ख़ुशी अपार |
ठीक-ठाक करके रखूं, कल मैं कमरे चार ||

माता को लेकर मिली, गई पिता के कक्ष |
अपनी इच्छा को रखा, सुनी राजसी पक्ष ||

सैद्धांतिक सहमति मिली, सौ पण का अनुदान |
कौशल्या शाळा खुली, हो नारी उत्थान ||

दूर दूर के कारवाँ, उनके संग परिवार ||
रूपा शांता संग में,  करने गई प्रचार ||

रुढ़िवादियों ने वहाँ, पूरा किया विरोध |
कई प्रेम से मिल रहे, कई दिखाते क्रोध ||

घर में खाने को नहीं, भटक रहे हो तीर |
जाने कब दुर्भिक्ष में, छोड़े जान शरीर || 

नौ तक की कन्या यहाँ, छोडो मेरे पास |
भोज कराउंगी उन्हें,  पूरे ग्यारह मास ||

इंद्र-देवता जब करें, खुश हो के बरसात |
 तब कन्या ले जाइए, मान लीजिये बात ||

गृहस्वामी सब एक से, जोड़-गाँठ में दक्ष |

मिले आर्थिक लाभ तो, समझें सम्मुख पक्ष ||


धरम-भीरु होते कई, कई देखते स्वार्थ |

जर जमीन जोरू सकल,इच्छित मिलें पदार्थ ||


चतुर सयानी ये सखी, मीठा मीठा बोल |
तेरह कन्यायें जमा, देती शाला खोल ||

एक कक्ष में दरी थी, उस पर चादर डाल |

तेरह बिस्तर की जगह, पंद्रह की तैयार ||


कक्ष दूसरा बन गया, फिर भोजन भंडार |

कार्यालय तीजा बना, कक्षा बनता चार ||


जिम्मेदारी भोज की, कौला रही उठाय |

सौजा दादी बन गई, बच्चों की प्रिय धाय ||


शांता पहली शिक्षिका, रूपा का सहयोग |

तख्ती खड़िया बँट गई,जमा हुवे कुछ लोग ||


रानी माँ आकर करें, शाळा शुभ-आरम्भ |

आड़े पर आता रहा, कुछ पुरुषों का दम्भ ||

जिम्मेदारी का वहन, करती बहन सटीक |
मौके पर मिलती खड़ी, बेटी सबसे नीक |
बेटी सबसे नीक, पिता की गुड़िया रानी |
चले पकड़ के लीक, बेटियां बड़ी सयानी |
रविकर का आशीष, बेटियाँ बढ़ें हमारी |
मातु-पिता जा चेत, समझ निज जिम्मेदारी ||

नित्य कर्म करवा रहीं, सौजा रूपा साथ |
आई रमणी रमण की, लगा रही खुद हाथ ||


पहले दिन की प्रार्थना, सादर शारद केर |

एकदन्त की विनय से, कटते बाधा-फेर ||


उबटन से ऊबी नहीं, मन में नहीं उमंग ।
पहरे है परिधान नव, सजा अंग-प्रत्यंग ।
सजा अंग-प्रत्यंग , नहाना केश बनाना ।
काजल टीका तिलक, इत्र मेंहदी रचवाना ।
मिस्सी खाना पान, महावर में ही जूझी ।
करना निज उत्थान, बात अब तक ना बूझी ।।

स्वस्थ बदन ही सह सके, सांसारिक सब भार |
बुद्धी भी निर्मल रहे, बढ़े सकल परिवार ||


रूपा के व्यायाम से, बच्चे थक के चूर ||

शुद्ध दूध मिलता उन्हें, घुघनी भी भरपूर ||


पहली कक्षा में करें, बच्चे कुछ अभ्यास ||

गोला रोटी सा करे, रेखा जैसे बांस ||


रिश्ते रिसियाते रहे, हिरदय हाट बिकाय ।
परिचित बेगाने हुए, ख़ुशी हेतु भरमाय ।

ख़ुशी हेतु भरमाय, नहीं अंतर-मन देखा।
धर्म कर्म व्यवसाय, बदल ब्रह्मा का लेखा । 

  दीदी का उपदेश, सरल सा चलो समझते ।
दिल में रखे सहेज, कीमती पावन रिश्ते ।।
एक घरी अभ्यास कर, गिनती सीखे जांय ||
दस तक की गिनती गिनें, रूपा रही बताय ||


सृजन-शीलता दे जला, तन-मन के खलु व्याधि ।
बुरे बुराई दूर हों, आधि होय झट आधि ।।


सृंगी के अभिलेख से, सीखी थी इक बात |
पारेन्द्रिय अभ्यास से, हुई स्वयं निष्णात ||


दोपहर में छुट्टी हुई, पंगत सभी लगाय |

हाथ-पैर मुंह धोय के, दाल-भात सब खाय ||


एक एक केला मिला, करते सब विश्राम |

कार्यालय में आय के, करे शांता काम ||


खेलों की सूची दिया, रूपा को समझाय |

दो घंटे का खेल हो, संध्या इन्हें जगाय ||


गौशाला से दूध का, भरके पात्र  मंगाय |

संध्या में कर वंदना, रोटी खीर जिमाय ||


सौजा दादी से कही,  एक कहानी रोज |

बच्चों को बतलाइये, रखिये दिन में खोज ||

किलकारी में हैं छुपे, जीवन के सब रंग ।
सबसे अच्छा समय वो, जो बच्चों के संग ।
जो बच्चों के संग, खिलाएं पोता पोती ।
दीपक प्रति अनुराग, प्यार से ताकें ज्योती ।
दीदी दादी होय, दीखती दमकी दृष्टी ।
ईश्वर का आभार, गोद में खेले सृष्टी ।  
राज-महल में शांता, बैठी ध्यान लगाय |
पावन मन्त्रों को जपे, दूरानुभूति आय ||


तिनका मुँह में दाब के, मुँह में उनका नाम ।
सौ जोजन का सफ़र कर, पहुंचाती पैगाम ।
पहुंचाती पैगाम, प्रेम में पागल प्यासी ।
सावन की ये बूंद, बढाए प्यास उदासी ।
पंछी यह चैतन्य, किन्तु तन को न ताके ।
यह दारुण पर्जन्य, सताते जब तब आके ।।
सृंगी के मस्तिष्क की, मिलती इन्हें तरंग ||
वार्ता होने लग पड़ी, रोमांचित हर अंग ||


सादर कर परनाम फिर, पूछी सब कुशलात ||

अंगदेश के बोलती, अपने सब हालात |


मिलता जब आशीष तो, जाय नेह में डूब |

बटुक परम भेजूं वहाँ, पढना चाहे खूब ||


स्वीकार करते ऋषी, करती ये अनुरोध |

एक शिक्षिका भेजिए, देवे  कन्या-बोध ||


माता खट-खट कर रहीं, ये बातों में लीन |

टूटा जो संपर्क तो,तड़पी जैसे  मीन ||

इक अति छोटे शब्द पर, बड़े बड़े विद्वान ।
युगों युगों से कर रहे, टीका व व्याख्यान ।

टीका व व्याख्यान,  सृष्टि को देती जीवन ।
न्योछावर मन प्राण, सँवारे जिसका बचपन ।
हो जाता वो दूर,  सभी सिक्के हों खोटे ।
कितनी वो मजबूर, कलेजा टोटे टोटे ।।

दालिम को जाकर मिली, अगले दिन समझाय |
परम बटुक गुरुकुल चले, हर्षित पढने जाय ||


वय है चौदह वर्ष की, पढने में था तेज |

आगे शिक्षा के लिए, रही शांता भेज ||

प्रीति होय न भय बिना, दंड बिना ना नीति ।
शिक्षा मिले न गुरु बिना, सद्गुण बिना प्रतीति ।
इक हफ्ते में आ गई, माँ का लेकर रूप |
नई शिक्षिका करे सब, शाळा के अनुरूप ||
अंग-देश में अकाल     
 शांता बिटिया वेद में, रही पूर्णत: दक्ष |
शिल्प-कला में भी निपुण, मंत्री के समकक्ष ||

उपवन में बैठी करें, राजा संग विचार |
अंगदेश को किस तरह, पूजे यह संसार ||

चर्चा में दोनों हुए, पूर्णतया तल्लीन |
सुख शान्ति से युक्त हो, धरती कष्ट विहीन ||


अंग भूमि से दूर हो, असुरों का संत्रास |
दूर भूख भय से रहे, करने बड़े प्रयास ||


लेने आश्रम के लिए, आये विप्र महान |
वर्षा ऋतु का आगमन, कृषी का सामान ||


अनदेखी राजा करे, क्रोधित होते साधु | 
घोर उपेक्षा तू करे, है अक्षम्य अपराधु ||


हरे-भरे इस राज्य में, होगी न बरसात |
शापित करके चल पड़े, कर तगड़ा आघात ||

जाते देखा विप्र को, दूर हुआ अज्ञान |

क्षमा मांगते भूपती, जूं  न रेंगे कान ||

भादों की बरसात भी, ठेंगा रही दिखाय |
बूंद बूंद को तरसती, धरती फट फट जाय ||

झाड़ हुए झंखाड़ सब, बची पेड़ की ठूठ |
कृषक बिचारा क्या करे, छूटी हल की मूठ ||

खाने को लाले पड़े, कंठ सूखते जाँय |
खिचड़ी दोने में बटे, गंगा माय सहाय ||

जीव जंतु अकुला रहे, तड़पें छोड़ें प्राण |
त्राहि-त्राहि त्रिशुच सहे, त्रायमाण दे त्राण ||

अंगदेश की अति-कठिन, कड़ी परीक्षा होय |
 नगर सेठ मंत्री सभी, रहे काम में खोय ||

शाला में हर दिन बढ़ें, कन्याएं दो-चार |
चार कक्ष करने पड़े, और अधिक तैयार ||

शांता ने अपना दिया, सारा कोष लुटाय |
सन्यासिन सी बन रहे, कन्या रही पढ़ाय ||
दुःख की घड़ियाँ गिन रहे, घडी-घडी सरकाय ।
धीरज हिम्मत बुद्धि से, जाएगा विसराय ।

जाएगा विसराय, लगें फिर सर में गोते ।
लो मन को बहलाय, धीर सज्जन न खोते ।

चक्र समय शाश्वत , घूम लाये दिन बढ़िया ।
होना मत कमजोर, गिनों कुछ दुःख की घड़ियाँ ।।
भीषण गर्मी से हुई, कुछ बाला बीमार |
वैद्य-राज की औषधी, माँ का देत दुलार ||
मिट्टी की पट्टी करे, जहाँ रोग उपचार |
गांधी जी का शुद्ध चित्त, ठीक करे बीमार |

ठीक करे बीमार, स्वयं भी रहे निरोगी |
उदाहरण ना अन्य, मिलें ना ऐसे योगी |

बड़ा भयंकर प्लेग, जहाँ गुम सिट्टी-पिट्टी |
गई व्यवस्था भाग, वहाँ बापू की मिट्टी ||
कौला हर दिन शाम को, कहती कथा बुझाय |
तरह तरह के स्वांग से, सबका मन बहलाय ||
संसाधन सा जानिये, संयुत कुल परिवार |
गाढ़े में ठाढ़े मिलें, बिना लिए आभार |

बिना लिए आभार, कृपा की करते वृष्टी |
दादा दादी देव, दुआ दे दुर्लभ दृष्टी |

सच्चे रिश्ते मुफ्त, हमेशा भला इरादा |
रखे सकल परिवार, सदा अक्षुण मर्यादा |
कभी कभी बादल घिरें, गरजे खुब चिग्घाड़ |
बरसें दूजे देश में, जाँय कलेजा फाड़ ||
बड़े पुन्य का कार्य है, संस्कार आभार ।
 तपे जेठ दोपहर की, मचता हाहाकार ।

मचता हाहाकार, पेड़-पौधे कुम्हलाये ।
जीव जंतु जब हार, बिना  जल प्राण गँवाए ।

हे मूरत तू धन्य , कटोरी जल से भरती ।
दो मुट्ठी भर कनक , हमारी विपदा हरती ।।
अनुष्ठान जप तप करें, पर ईश्वर प्रतिकूल |
ऊपर उड़ते गिद्ध-गण, नीचे उड़ती धूल ||

धीरे धीरे कम हुआ, सूरज का संताप |
मार्गशीर्ष की शीत से, रहे लोग अब काँप ||

कैकय का गेंहूँ वणिक,  बेचें ऊंचे दाम |
अवधराज पर बांटते, सबको धान तमाम ||
१)
अत्याधिक हुशियार हैं, दुनिया मूर्ख दिखाय।
जोड़-तोड़ से हर जगह, लेते जगह बनाय ।।
२)
सचमुच में हुशियार हैं, हित पहलें ले साध ।
 कर्म वचन में धार है , बढ़ते  रहें अबाध ।।
 ३)
 इक बन्दा सामान्य है, साधे जीवन मूल ।
 कुल समाज भू देश हित, साधे सरल उसूल ।
४)
इस श्रेणी रविकर पड़ा, महामूर्ख अनजान ।
दुनियादारी से विलग, माने चतुर सयान ।। 
अंगदेश पर जो पड़ी, यह दुर्भिक्षी मार |
आगामी गर्मी भला, कैसे होगी पार ||
 अंतर-मन से बतकही, होती रहती मौन ।
सिंहावलोकन कर सके, हो अतीत न गौण ।

हो अतीत न गौण, जांच करते नित रहिये ।
चले सदा सद्मार्ग, निरंतर बढ़ते रहिये ।
परखो हर बदलाव,  मुहब्बत  अपनेपन से ।
रहे अबाध बहाव, प्रेम-सर अंतर्मन से |
लोग पलायन कर रहे, राजा हैं मजबूर |
बड़े मनीषी हैं जमा, सृन्गेश्वर में दूर ||

किया आकलन काल का, ढूंढा सहज उपाय |
रिस्य सृंग का ब्याह शुभ, शांता से हो जाय ||

लेकर इस सन्देश को, परम बटुक हैं जात |
साधू दुल्हा सोच के, माँ चम्पा अकुलात ||

शाला आये सोम्पद, रूपा से टकरात |
सुन्दरता ऐसी लगी, जैसे हो अभिजात ||

नथुनी संग सुनार के, करती नित गुणगान ।
सुन्दर काया जो दिया,  भूली वो नादान ।
भूली वो नादान, नाक नथुनी का अन्तर । 
लागे भला सुनार,  याद न करती ईश्वर ।
अगर कटे यह नाक, करेगी क्या तू बाला ।
प्रकट करो आभार, प्रभू जो नाक सम्भाला ।।
कार्यालय में जा जमे, दीदी पहुंची जाय |
विषम परिस्थिति पर वहां, वे दोनों बतलाय ||

सावन में भी न हुई, अब तक इक बरसात |
दीदी की आज्ञा मिले, आये तभी बरात ||

भाई मेरी शर्त दो, पूरी करिए आप |
मुझको न एतराज है, मिटे विकट संताप ||

शाळा का इक भवन हो, मिले बड़ा अनुदान |
संरक्षक बन कर रहें, हो सबका कल्याण ||

तन मन धन जीवन करूँ, दीदी तेरे नाम |
शर्त दूसरी भी कहो, निपटाने हैं काम ||

रूपा लेकर आ गई, पानी के दो पात्र |
चेहरे पर थी विद्वता, थी शांता की छात्र ||
सिलवट पर पिसता रहा, याद वाद रस प्रेम ।
 ऐ लोढ़े तू रूठ के,  भाँड़  रहा है गेम ।
 भाँड़ रहा है गेम, नेम शाश्वत अब टूटे ।
वासर ज्यूँ अखरोट,  नहीं तेरे बिन फूटे ।
पाता था नित चैन, लुढ़क जो बदले करवट ।
बिन तेरे दिन रैन, तड़पता रहता सिलवट ।।
शांता बोली फिर कभी, रख दूंगी यह बात |
आगे काम बढ़ाइए, हो जाये बरसात ||
 बंधन काटे ना कटे, कट जाए दिन-रैन ।
विकट निराशा से भरे, आशा दीदी बैन ।

आशा दीदी बैन, चैन मन को ना आये  ।
न्योछावर सर्वस्व,  बड़ी बगिया महकाए ।
फूलों को अवलोक, लोक में खुशबू  तेरी  ।
नारी मत कर शोक, मान ले मैया मेरी ।।  
शांता बाहर ज्यों गई, पड़ी सोम की दृष्ट |
 मित्रों ने सच ही कहा, रूपा है उत्कृष्ट ||

कैसी शाळा चल रही, कितनी कक्षा वर्ग |

रूपा की बोली मधुर, बतलाई हर सर्ग ||


जाते हैं युवराज तो, कर उनको परनाम |

निपटाने रूपा लगी, एक-एक कर काम ||


बटुक परम के पास जा, शांता पूछे हाल |

आश्रम में रखते सभी, उसका बेहद ख्याल ||


गुरुवर दीदी के लिए, भेजे हैं रुद्राक्ष |

रूपा जानी यह खबर, करती व्यंग-कटाक्ष ||


हँसी हँसी में कह गई, बातें रूपा गूढ़ | 

शांता खोई याद में, लगे पुरनिया-बूढ़ ||


संदेशा भेजें अवध, अवधि हो रही पार |

मात-पिता
निश्चित करें, शुभ-विवाह का वार ||

परम बटुक के साथ में, जाँय सोम युवराज |

बिबिंडक के शरण में, होंय सिद्ध सब काज ||


लग्न-पत्रिका सौंपते, कर पूजा अरदास |

सादर आमंत्रित करें, उल्लेखित दिन ख़ास ||


परम बटुक मिलने गया, रिस्य सृंग के कक्ष |

किया दंडवत प्रेम से, रखे अंग का पक्ष || 


गुरुवर की होवे कृपा, मिले मार्ग-निर्देश  |
शंकर के दर्शन सुलभ, चढ़ने में क्या क्लेश ??
चढ़ने में क्या क्लेश, सीड़ियाँ चढ़ते जाएँ ।
जय जय जय गुरुदेव, खटाख़ट बढ़ते जाएँ ।
बुद्धू पंगु-गंवार, भक्त भोला भा रविकर ।
सर-सरिता गिरि-खोह, कहाँ बाधा हैं गुरुवर ।।
दीदी ने भेजा प्रभू , यह इक मुट्ठी धान |
मूक रहीं थी उस समय, अधरों पर मुस्कान ||


लेकर दोनों हाथ से, कहते माथ लगाय  |

सुन्दर क्यारी साजिए, राखूँ पौध बनाय ||


वार्षिक-उत्सव
स्त्री-शिक्षा पर लिखा,  सृंगी का इक लेख |
परेंद्रीयी ज्ञान से, रही शांता देख ||

चाहे तारे तोड़ना, तोड़ ना मेरी चाह ।
रख इक टुकड़ा हौसला, वाह वाह भइ वाह ।।

धयान-मग्न होकर करे, सृंगी से वह बात |
अबला की पर-निर्भरता, सहे सदा आघात ||

नव महिने में जो भरे, मानव तन में प्राण |
ग्यारह में क्यों न करे, अपना नव-निर्माण ||

मेहनत अपनी जाँचिये, कह सृंगी समझाय |

कन्याओं को देखिये, झट उत्तर मिल जाय ||


व्यय पूरा कैसे पड़े, सबकुछ तो प्रतिकूल |

शांता हुई विचारमग्न, सच्चे सरल उसूल ||

सावन में पूरे  हुए,  पहले ग्यारह मास |
बालाओं के लिए थे, ये अलबेले ख़ास ||

कन्याएं साक्षर हुईं, लिख लेती निज नाम |
फल-फूलों के चित्र से, खेलें वे अविराम ||

ग्यारह महिने में पढ़ीं दो वर्षों का पाठ |
तीन पांच भी बूझती, बारह पंजे साठ ||

करने में सक्षम हुईं, अपने जोड़ -घटाव  |
दिन बीते कुल तीन सौ, बापू वापस आव ||

आई श्रावण पूर्णिमा, राखी हैं तैयार |
सूत कात के रुई से, ताक रही हैं द्वार ||

मात-पिता के साथ में, भाई कुल दो-चार |
सब कन्याएं लें मना,  राखी का त्योहार ||

स्नेह-सूत्र को बाँध के, बालाएं अकुलायं |
बापू उनको फिर कहीं, वापस न ले जाँय ||

दो कन्याएं रो रहीं, मिला नहीं परिवार |

कैसे हैं माता-पिता, कैसे देत विसार ||


पता किया जब हाल तो, मिला दुखद सन्देश |

दक्षिण दिश को थे गए, असुरों के परदेश ||

वक्त वक्त की बात है, बढ़िया था वह दौर |
समय बदलता जा रहा, कुछ बदलेगा और |


कुछ बदलेगा और, आग से राख हुई जो |
पानी धूप बयार, प्यार से तनिक छुई जो  |


मिट जायेगा दर्द, सर्द सी सिसकारी में |
ढक जाएगा गर्द, और फिर लाचारी में |


शांता अब देने लगी, उनपर वेशी ध्यान |

कैसे भी पूरे करूँ, इनके सब अरमान ||


अपने गहने भी किये, इस शाळा को भेंट |

दो कपड़ों में रह रही, खुद को पुन: समेट ||


 
बारह बाला घर गईं, थी जो दस से पार |
कर के सब की वंदना, देकर के आभार ||

नीति नियम रक्खी बना, दस तक शिक्षा देत |
कथा जुबानी सिखा के, प्रति अधिकार सचेत ||

दस की बाला को सिखा,  निज शरीर के भेद |

साफ़ सफाई अहम् है, काया स्वच्छ सुफेद ||



वाणी मीठी हो सदा, हरदम रहे सचेत |

चंडी बन कर मारती, दुर्जन-राक्षस प्रेत ||



बाखूबी वह जानती, सद-स्नेहिल स्पर्श |

गन्दी नजरें भापती, भूले न आदर्श ||

सालाना जलसा हुआ, आये अंग-नरेश |
प्रस्तुतियां सुन्दर करें, भाँति-भाँति धर भेस ||

इक नाटक में था दिखा, निपटें कस दुर्भिक्ष |
तालाबों की महत्ता, रोप-रोप के वृक्ष ||

जब अकाल को झेलता, अपना सारा देश |
कालाबाजारी विकट, पहुंचाती है ठेस ||

बर्बादी खाद्यान  की, लो इकदम से रोक  | 
जल को अमृत जानिये, कन्या कहे श्लोक ||

गुरुकुल के आचार्य का, प्रस्तुत है उदबोध ||

नारी शिक्षा पर रखें, अपने शाश्वत शोध ||


दस शिक्षक के तुल्य है, इक आचार्य महान |

सौ आचार्यों से बड़ा, पिता तुम्हारा जान ||



और हजारों गुनी है, इक माता की शान |

उनकी शिक्षा सर्वदा, उत्तम और महान ||



गार्गी मैत्रेयी सरिस, आचार्या कहलांय |
गुरु पत्नी आचार्यिनी, कही सदा ही जाँय ||



कात्यायन  की वर्तिका,  में सीधा उल्लेख |

महिला लिखती व्याकरण, अति प्रभावी लेख ||



महिला शिक्षा पर करे, जो भी खड़े सवाल |

पतंजलि को देखिये, आग्रह-
पूर्व निकाल ||

शांता जी ने है किया, बड़ा अनोखा कार्य |

देता खुब आशीष हूँ, मै उनका आचार्य ||


भेजूंगा कल पाठ्यक्रम, पांच साल का ज्ञान |

तीन वर्ष में ये करें, कन्या गुण की खान ||


अब राजा अनुदान को, चार गुना कर जाँय |
शांता सन्यासिन बनी, जीवन रही बिताय ||

शाळा की चिंता लिए, दुरानुभूती साध |
सृंगी से करने लगी, चर्चा परम अगाध ||

त्याग प्रेम बलिदान की, नारी सच प्रतिमूर्ति ।
दफनाती सारे सपन, सरल समस्या-पूर्ति ।


सरल समस्या-पूर्ति
, पाल पति-पुत्र-पुत्रियाँ ।
आश्रित कुल परिवार, चलाती कुशल स्त्रियाँ ।

 
निभा रही दायित्व, किन्तु अधिकार घटे हैं ।
  हरते जो अधिकार, पुरुष वे बड़े लटे हैं ।।
विस्तृत चर्चा हो गई, एक पाख ही हाथ |
छूटेगा सचमुच सकल, कन्याओं का साथ ||

 करे व्यवस्था रोज ही, सुदृढ़ अति मजबूत |
सृन्गेश्वर की शिक्षिका, पाती शक्ति अकूत ||

आचार्या प्रधान बन, लेत व्यवस्था हाथ |
सौजा कौला साथ में, रूपा का भी साथ ||

ब्रह्मावादिन आत्रेयी, करती अग्निहोत्र |
बालाओं की बन रही, संस्कार की स्रोत्र ||

साध्यवधू शांता करे, सृगेश्वर का ध्यान |
सखियों के सहयोग से, कार्य हुए आसान ||
आशंका चिंता-भँवर, असमंजस में लोग ।
चिंतामणि की चाह में, गवाँ रहे संजोग । 

 गवाँ रहे संजोग, ढोंग छोडो ये सारे ।
मठ महंत दरवेश, खोजते मारे मारे ।

एक चिरंतन सत्य, फूंक चिंता की लंका ।
हँसों निरन्तर मस्त, रखो न मन आशंका ।।   




शांता-सृंगी विवाह
इन्तजार इस व्याह का,  करते राजा-रंक | 
अति लम्बे दुर्भिक्ष का, झेला दारुण-डंक ||
इन्तजार की इन्तिहा, इम्तिहान इतराय ।
मिलो यार अब तो सही, विरह सही न जाय ।।

वरुण देव करते रहे, मिटटी महा पलीद |
रिस्य रिसर्चर सृंग से, जागी अब उम्मीद ||

शांता के सद्कर्म से, अब होगा कल्याण |
तड़प-तड़प जीते रहे, बच जायेंगे प्राण ||

रीति-कर्म होने लगे, वैवाहिक संस्कार |
राजमहल के सामने, लागी भीड़ अपार ||

भंडारे में आ रहे, दूर दूर से लोग |
पांच दिनों से खा रहे, सारे नियमित भोग ||

सृन्गेश्वर में सज गई, शंकर सी बारात |
परम बटुक लेकर चला, वर्षा की सौगात ||

दुल्हे संग इक पोटली, रही बगल में साज |
तरह तरह के साज से, गुंजित मधु-आवाज ||

दस बारह दिन से यहाँ,  गरजें बादल खूब |
बेमतलब के नाट्य से, रही शांता ऊब ||
गरज हमारी देख के,  गरज-गरज घन खूब ।
बिन बरसे वापस हुवे, धमा-चौकड़ी ऊब ।
 
धमा-चौकड़ी ऊब, खेत-खलिहान तपे हैं ।
तपते सड़क मकान, जीव भगवान् जपे है ।

त्राहिमाम हे राम, पसीना छूटे भारी ।
भीगे ना अरमान, भीगती देह हमारी ।। 
जैसे चंपा नगर में, करता वर परवेश |
भूरे बादल छा गए, जस ताकें आदेश ||

सादर अगवानी करे, राजा राजकुमार |
बिबंडक ऋषि का सभी, करते हैं आभार ||

होय मंगलाचार इत, उत पानी बुंदियाय |
दादुर टर-टर बोलते, जीव-जंतु हर्षाय ||
रचना ईश्वर ने रची, तन मन मति अति-भिन्न |
प्राकृत के विपरीत गर, करे खिन्न खुद खिन्न |
इधर बराती चापते, छक के छप्पन भोग |
परम बटुक ढूंढे उधर, अच्छा एक सुयोग ||

साधारण से वेश में, पीयर धोती पाय |
धीरे धीरे शांता, बैठी मंडप आय ||
दृष्टि-भेद से उपजते, अपने अपने राम |
सत्य एक शाश्वत सही, वो ही हैं सुखधाम |
जमे पुरोहित उभय पक्ष, सुन्दर लग्न विचार |
गठबंधन करके  भये,   फेरे को तैयार ||

पहले फेरे के वचन,  पालन-पोषण खाद्य |
संगच्छध्वम बोलते, बाजे मंगल वाद्य ||

स्वस्थ और सामृद्ध हो, त्रि-आयामी स्वास्थ |
भौतिक औ अध्यात्म सह, मिले मानसिक आथ ||

धन-दौलत शक्ति मिले, ख़ुशी मिले या दर्द |
भोगे मिलकर संग में, दोनों औरत-मर्द ||

इक दूजे का नित करें, आदर प्रति-सम्मान |
परिवारों के प्रति रहे, इज्जत एक समान ||

सुन्दर योग्य बलिष्ठ हो, अपने सब संतान |
कहें पांचवा वचन ये, विनवौं हे भगवान् ||

शान्ति-दीर्घ जीवन मिले, रहे हमारा साथ |
सिद्ध सदा करते रहें, इक दूजे के स्वार्थ ||

एक दूसरे के प्रती, समझदार साहचर्य |
वफादार बनकर रहें, बने रहें आदर्य ||

सातों वचनों को करें, दोनों अंगीकार |
बारिश की लगती झड़ी, होय मूसलाधार ||
 वर्षा होती एक सी, उर्वर लेती सोख |
ऊसर सर सर दे बहा, रहती बंजर कोख |

रहती बंजर कोख, कर्म कुछ अच्छे कर ले |
बड़ा हृदय-विस्तार, गढ़न गढ़ करके भर ले |

कोमल-आर्द्र स्वभाव, उगेंगे अंकुर प्यारे |
मत चल हरदम दांव, सही कर रखो किनारे ||
तीन दिनों तक अनवरत, भारी वर्षा होय |
घुप्प अँधेरा छा रहा, धरती दिया भिगोय ||

किच-किच होता महल में, लगे ऊबने लोग |
भोजन की किल्लत हुई, खले लाग संयोग ||

सूर्य-देवता ने दिया,  दर्शन चौथे रोज |
मस्ती में सब झूमते, नव- आशा नव-ओज ||

वैवाहिक सन्दर्भ में, शुरू हुई फिर बात |
विधियाँ सब पूरी हुईं, विदा होय बारात ||

शांता ने सादर कहा, सुनिए प्रिय युवराज |
कन्याशाळा के भवन, का कैसा है काज ||

मुझे देखनी है प्रगति, ले चलिए अस्थान |
सृंगी-रूपा भी चले,  आत्रेयी मेहमान ||

आधा से ज्यादा बना, दो एकड़ फैलाव |
सृंगी बोले बटुक से, वह थैली ले आव ||

गीली थैली जब तलक, बटुक वहां पर लाय |
चार क्यारियाँ  स्वयं ही, सृंगी रहे बनाय ||

शांता ने रुद्राक्ष के, बदले भेजा धान |
औषधियेय प्रभाव से, डाली इसमें जान ||

मन्त्रों से ये सिद्ध हैं, उच्च-कोटि के धान |
अन्नपूर्णा की कृपा, सदा सर्वदा मान ||

चार क्यारियों में इन्हें, रोपें स्त्री चार ||
बारह-मासी ये उगें, जस जिसका व्यवहार ||

कन्याओं को नित मिले, मन-भर बढ़िया भात ||
द्रोही गर इनको छुवे, होय तुरत आघात ||

आत्रेयी रूपा सहित, शांता रमणी जाय |
अपनी अपनी क्यारियाँ, सुन्दर देत सजाय ||

बोलें भैया सोम्पद,  इक-हजार अनुदान |
नियमित मिलिहै कोष से, रुके नहीं अभियान ||

दीदी मैंने शर्त ये, पूरी कर दी आज |
दूजी अपनी शर्त का, खोलो अबतो राज |

जुटे बहुत से लोग हैं, रहे राज अब राज |
कभी बाद में मैं कहूँ, क्या तुमको एतराज ||

दीदी मैं तो आपका, अपना छोटा भाय |
हर इच्छा पूरी करूँ, गंगे सदा सहाय ||

सृंगी के आशीष से, बहुरे मंगल-मोद |
हरी भरी होने लगी, अंगदेश की गोद ||

रूपा के सानिध्य में, चंचल राजकुमार |
आँख बचा कर सभी की, करता आँखें चार ||
नयन से चाह भर, वाण मार मार कर
ह्रदय के आर पार, झूरे चला जात है |

नेह का बुलाय लेत, देह झकझोर देत
झंझट हो सेत-मेत, भाग भला जात है |

बेहद तकरार हो, खुदी खुद ही जाय खो
पग-पग पे कांटे बो, प्रेम गीत गात है |

मार-पीट करे खूब, प्रिय का धरत रूप
नयनों से करे चुप, ऐसे आजमात  है ||
शांता से छुपता नहीं, लेकिन यह व्यवहार |
रमणी को वह सौंपती, रूपा का सब भार ||
मिलन आस का वास हो, अंतर्मन में ख़ास ।
सुध-बुध बिसरे तन-बदन, गुमते होश-हवाश ।  

गुमते होश-हवाश, पुलकती सारी देंही ।
तीर भरे उच्छ्वास,  ताकता परम सनेही ।

वर्षा हो न जाय, भिगो दे पाथ रास का  ।
अब न मुझको रोक, चली ले मिलन आस का ।।

मुश्किल में, दिल में मिले, बढ़े आत्म-विश्वास |
कंटक-पथ पर बढ़ चले, साथ मिले जो ख़ास |


साथ मिले जो ख़ास, रास हरदम आता है |
मात्र साथ एहसास, हमें रविकर भाता है |


जीवन इक संघर्ष, हमेशा विजय कामना |
बढ़ता मित्र सहर्ष, हाथ तू "सदा" थामना ||


बीस वर्ष का हो गया, लम्बा यहाँ प्रवास |
शांता आगे बढ़ चली, फिर से नए निवास ||

है कैसी यह बिडम्बना, नारी जैसे धान |
बार-बार बोई गई, बदल-बदल स्थान ||

धान कूट के फिर मिले, चावल निर्मल-श्वेत |
खेत-खेत की यात्रा, हो जाती फिर खेत ||

कौला का वियोग 
अंग-अवध छूटे सभी, सृंगी के संग सैर |
शांता साध्वी सी बनी, चाहे सबकी खैर ||
 झूठ-सांच की आग में, झुलसे अंतर रोज |
किन्तु हकीकत न सके, नादाँ अब तक खोज |

नादाँ अब तक खोज, बड़े वादे दावे थे |
राष्ट्र-भक्ति के गीत, सुरों में खुब गावे थे |

दृष्टि-दोष दम फूल, झूल रस्ते में जाते |
भूले सही उसूल, गलत अनुसरण कराते ||
 कौला मुश्किल से सहे, हुई शांता गैर |
खट्टे-मिट्ठे दृश्य सब, गए आँख में तैर ||
  चौपाई 
रावण की दारुण अय्यारी | कौशल्या पर पड़ती भारी ||
कौशल्या का हरण कराये | पेटी में धर नदी बहाए ||

दशरथ संग जटायू धाये | पेटी सागर तट पर पाए ||
नारायण जप नारद आये | कौशल्या संग व्याह कराये ||

अवध नगर में खुशियाँ छाये | खर-दूषण योजना बनाये |
कौशल्या का गर्भ गिराया | पल-पल रावण रचता माया ||

सुग्गासुर आया इक पापी | गिद्धराज ने गर्दन नापी ||
नव-दुर्गा में खीर जिमाये |  नन्हीं-मुन्हीं कन्या आये ||

रानी फिर से गर्भ धारती | कौला विपदा विकट टारती ||
कौशल्या का छद्म वेश धर | सात मास मैके में जाकर ||

रावण के षड्यंत्र काटती | कौशल्या को ख़ुशी बांटती ||
शांता खुशियाँ लेकर आये | कौला को भी पास बुलाये ||

खुशियों पर ग्रहण लग जाता | शांता का इक पैर पिराता ||
नीमसार में सारे आते | दूर-दूर से वैद्य बुलाते ||

दशरथ कौशल्या सम गोती | गोतज से बीमारी होती ||
कन्या को अब गोद दीजिये | औषधि का नित लेप कीजिये ||

अंगदेश के राजा आते | शांता को ले गोद खिलाते ||
चम्पारानी खुब हरसाती | सूनी बगिया खिल-खिल जाती ||

दशरथ सुन्दर नाव सजाते | दास दासियाँ भी भिजवाते ||
कौला बच्ची को बहलाती | रस्ते में दालिम को पाती ||

दालिम सौजा का सौतेला | लड़े बाघ से निपट अकेला ||
 उससे भाई एक बचाए |  एक पूत को बाघ मिटाए ||


राजा देता ग्राम निकाला | किन्तु स्वयं ही उसे संभाला ||
शांता का रक्षक बन जाता | किस्मत पर अपनी मुस्काता ||


शांता अंगदेश आ जाती | कौला औषधि रोज लगाती ||
नामकरण में दशरथ आये | शांता पहला कदम बढाए ||

चम्पारानी गोद खिलाती | पुत्र सोम प्यारा सा पाती ||
कौला भी बन जाती माता | रूपा और बटुक का नाता ||

शांता से ज्यादा गहराता | बटुक पास में उसके जाता ||
गुरुकुल पढ़ने सोम जा रहे | नियमित घर आचार्य आ रहे || 

शांता को वे रोज पढ़ाते | रूपा और बटुक भी जाते ||
आठ साल में पूरी शिक्षा | शांता करती पास परीक्षा ||

वन विहार को शांता जाती | किन्तु महल में नहीं बताती ||
रूपा और बटुक भी जाए | काका अपनी जान लड़ाए ||

मिली ताड़का घेरी काका | काका बोला भाग तडाका ||
जान बची तो लाख उपाया | कई दिनों में काका आया ||

सृन्गेश्वर में सृंगी मिलते | दोनों के मन-हृदय पिघलते ||
शोध पे  लम्बी चर्चा होती | पुत्रकाम का सूत्र पिरोती ||

दशरथ यग्य कराते द्वारे | चार पुत्र पा जाते प्यारे ||
पड़े मुसीबत राम सहारा | भरत लखन शत्रुघ्न  दुलारा || 

शांता की जागी इक इच्छा | शुरू कराऊं नारी शिक्षा ||
कौशल्या शाला वह खोले | आचार्या बाला की हो ले ||

सूखा और अकाल अंग में | मरते जैसे लोग जंग में ||
पूरे साल सूखती धरती | शांता जन-जन के दुःख हरती ||
धरती के वस्त्र पीत, अम्बर की बढ़ी प्रीत 
भवरों की हुई जीत, फगुआ सुनाइये ।
जीव-जंतु हैं अघात, नए- नए हरे पात 
देख खगों की बरात, फूल सा लजाइये ।
चांदनी शीतल श्वेत, अग्नि भड़काय देत 
कृष्णा को करत भेंट, मधुमास आइये ।  
धीर जब अधीर हो, पीर ही तकदीर हो 
उनकी तसवीर को , दिल में बसाइए ।।
दोहे 
रो-गाकर करते विदा, छूटा फिर से देस |
किस्मत में उसके लिखा, बार बार परदेस ||

सभी हितैषी छूटते, रिश्ते बने नवीन |
परम बटुक ही है यहाँ, शिक्षा में लवलीन ||

पेटी इक श्रृंगार की,  संग में मंगल-हार |
इक माला रुद्राक्ष की, सृंगी  का उपहार ||

प्रियवर मैं समझी नहीं, भेजा जो रुद्राक्ष |
धारण करने से कहीं, काक होय ताम्राक्ष ||

समझे बिन कैसे धरी, फिर सन्यासिन रूप |
सुख सुविधा सारी तजी, त्याग भूप का कूप ||

निश्छल शांता की हँसी, लेती तब मन -मोह |
प्रतिदिन उनकी प्रीत है,  करती सद-आरोह ||

शाळा को अर्पित किया, सारा मंगल कोष |
मंगल-मंगल हो रहा, मंगलमय संतोष ||

 कन्या हर परिवेश में, पाए शिक्षा दान |
शिक्षित माता दे बना, सचमुच देश महान ||

आधी आबादी अगर, पाए न अधिकार |
सारे शासक-वर्ग को, है सौ-सौ धिक्कार ||

मैंने भेजा धान जब, हमको था यह भान |
रिस्य बूझ लेंगे तुरत,  देंय उचित अस्थान ||  

एक कदम आगे बढे, करवाया एहसास |
चार क्यारियों से किया, मात-पिता के पास ||

आश्रम में शांता 
दो दिन का करके सफ़र, पहुंची कोसी तीर |
आश्रम में स्वागत हुआ, मिटी पंथ की पीर ||

अगला दिन अति व्यस्त था, अति-प्रात: उठ जाय |
आज्ञा लेकर सास की, नित्य कर्म निबटाय ||

कोशी की पूजा करे, कुलदेवी के बाद  |
सृन्गेश्वर को पूजती, मन में अति-अह्लाद ||

सास ससुर के चरण छू, बना रही पकवान |
आश्रम के सब जन बने, शांता के मेहमान ||

बड़ी रसोई में जले, चूल्हे पूरे सात |
दही बड़े जुरिया बनी,  उरद-दाल सह भात ||

आलू-गोभी की पकी, सब्जी भी रसदार |
मेवे वाली खीर से, छाई वहाँ बहार ||

दस पंगत लम्बी लगी, कुल्हड़ पत्तल साज |
भोजन लगी परोसने, अन्नपूर्णा आज ||

परम बटुक संग में लगा, रिस्य सृंग पद भूल |
अतिथि हमारे देवता, सबको किया क़ुबूल ||

परम बटुक से खुश सभी, शारद सदा सहाय |
एक बार के पाठ से, गूढ़ विषय आ जाय ||

पढ़े चिकित्सा शास्त्र वो, विषय बहुत ही गूढ़ ||
परंपरा के ज्ञान पर,  होकर के आरूढ़ ||

मन मानव कल्याण में, धन दौलत को भूल |
दीन-दुखी बीमार की, सेवा बने उसूल ||

नए शोध पर रख रहा, अपनी तीक्ष्ण निगाह |
कम कैसे हो सकेगी, अति-दर्दीली आह|

दीदी की ससुराल में, बनकर सच्चा भाय |
सेवा सुश्रुषा करे, गुरुकुल को महकाय ||

दूर-दूर से आ रहे,  याचक-दाता द्वार |
रोगी भी करवा रहे, आश्रम में उपचार ||

कुछ प्रतिनिधि विनती करें, कृपा कीजिये नाथ |
घाटी की बिगड़ी दशा, नहीं सूझता  पाथ ||
 
देव हिमाचल भूमि में, बिगढ़ रहे हालात  |
वर्षा ऋतु आधी गई, हुई नहीं बरसात ||

खाने के लाले पड़े, नंगे होंय पहाड़ |
हिंसक जीवों की वहाँ, गूंजे लगी दहाड़ ||

देव मनुज गन्धर्व सब, ऋषिवर परजा तोर |
घाटी की विपदा हरो, जन जन रहा अगोर ||

 ऋषी बिबंडक ने कहा, रखिये मन में धीर |
 जल्दी ही मिट जाएगी, यह त्रिशुच की पीर ||

सृंगी से कहने लगे, हुआ पूर इक साल |
शांता को भिजवाइए, अब अपनी ससुराल ||
 
कार्य यहाँ के पूर्ण कर, करिए अब प्रस्थान |
बड़ी समस्या का करें, समुचित शीघ्र निदान ||

हाथ जोड़कर बोलते, सृंगी मन की बात |
सहमत ऋषिवर हो गए, बतिया बड़ी सुहात ||

जाय संभालो राज को, शांता को ले जाव |
पड़े  रास्ते  में  अवध, भाई से मिलवाव ||

मात पिता के चरण छू, परम बटुक ले साथ |
रामचंद्र  को  भेंटते , देव भूमि के पाथ ||

चरण छुवे भ्राता सभी, पाते आशीर्वाद |
शांता को आते रहे,  पूरे  रस्ते  याद ||

दशरथ, तीनों रानियाँ, आवभगत में लाग |
इन अभिनव मेहमान से, भाग अवध के जाग ||

सारी परजा आ गई, करती जय जयकार |
उपहारों का लग गया, बहुत बड़ा अम्बार ||

सृंगी शांता बोलते, हम सन्यासी लोग |
चीजें संचय न करें, करे नहीं अति भोग ||

कृपा करके दीजिये, अनुमति हे श्रीमान |
ढूंढ़ जरूरतमंद को, बांटो यह सामान ||

कौशल्या मानी नहीं, मेवा फल मिष्ठान |
दो दिन खातिर संग में, बाँधीं कुछ पकवान || 

पलकों पर बैठा रहे, देवभूमि के लोग |
भीगी आँखें बरसती, वर्षा का संयोग ||

राजकाज में जा फंसे, रिस्य सृंग महराज |
प्रमुख सभी आने लगे, प्रेम-पालकी साज ||

कर सबको आश्वस्त तब, रिस्य रिसर्चर राज |
कर्म गूढ़ करने लगे, सिरमौरी को साज ||

रिस्य गुफा में कर रहे, बैठ लोक-कल्यान |
बटुक परम चढ़ता रहा, शिक्षा के सोपान ||  

उधर अंग में मच रहा, उथल-पुथल गंभीर |
रूपा को लग ही गए,  कामदेव के तीर ||

अंगराज अब स्वस्थ हैं, महामंत्री  संग |
मुश्किल हल करते रहे, प्रगति-पंथ पर अंग ||

शाला में बाला बढीं, नया भवन बनवाय |
आचार्या बारह नई, माली श्रमिक बुलाय ||

इंतजाम उत्तम किया, फैले यश चहुँ ओर |
पुंड्रा बंग विदेह जन, शाला रहे अगोर ||

परिवर्तन आया सुखद, आगे बढ़ता अंग |
नीति-नियम से चल रही, शाला नूतन ढंग ||

सोम सदा आता रहा,  कन्या-शाला पास |
रूपा से करता रहे, बातें चुप-चुप ख़ास ||

राजमहल जाने लगी, रूपा भी  दो बार |
गंगा तट पर विचरती, आई नई बहार ||
लम्बे-लम्बे  इन्तजार से, खुब  तड़पाते  हो |
गोदी में सिर रखकर प्रियतम गीत सुनाते हो |

देर  से  आने  की  झूठी,  सब - गाथा गाते हो,
पलकें पोल खोलती  फिर भी बात बनाते हो |

शब्दों  के तुम  बड़े  खिलाड़ी  भाव  जमाते हो
अवसर पाकर अंगुली पकड़ी "पहुंचा" पाते हो |

प्यासी धरती पर रिमझिम सावन बरसाते हो  
मन-झुरमुट में हौले से  प्रिय फूल खिलाते हो |

एक-घरी रुक के खुद को  जो  व्यस्त बताते हो,
अनमयस्क से इधर उधर कर समय बिताते हो |

रह-रह कर के  विरह-अग्नि बरबस भड़काते हो, 
रह-रह करके पल-पल तन-मन आग लगाते हो |



फिर  आने  का  वादा  करके  वापस  जाते हो,
वापस जाकर के फिर से,  ना प्यार दिखाते हो  ||

 कैसा अंतर्द्वंद यह, कैसा यह संताप |
चाहूँ तुम्हे पुकारना, पर रहती चुपचाप |



पर रहती चुपचाप, अश्रु-धारा को धारा |
रही रास्ता नाप, पुकारी नहीं दुबारा |

प्रीति नहीं अपनाय, गुजारिश ठुकराते हो  |
पोता भाई पुत्र, इन्हें ही अपनाते हो | 
सोम फ़िदा उसपर हुए, मीठीं बातें बोल |
रूपा के तनबदन में, रहे  प्रेम-रस घोल ||

रूपा को व्याकुल करे, शांता केर विछोह |
भटके मन हो बावली, होय सोम से मोह ||

तरुण सोम चंचलमना, चल शाळा की ओर |
मानो कोई खींचता,  कठपुतली की डोर ||
 
शांता नित करती रही, कन्या-शाळा याद |
प्राकृति पहुंचाई वहाँ, रूपा का उन्माद  ||

अनमयस्क सी शांता, रहने लगी उदास |
कार्य सिद्ध करके ऋषी, लौटे शांता पास ||

बारिस की बूंदें गिरीं, बीत रहा इक माह |
मैके जाना चाहिए, शांता करे सलाह || 

फेरे की इक रस्म है, करिए उसको पूर |
नदी मार्ग से जाइए, अंगदेश अति दूर ||

हुई पालकी में विदा, ऊँचीं नीची राह |
धीरे-धीरे छूटते, गिरी कन्दरा गाह ||


तेज धार धीमी हुई, आया सम मैदान |
नाविक गण फिर थामते, यात्रा केर कमान ||
 
निश्चित तिथि पर चल पड़ी, परम बटुक के साथ |
नाव सजा के बैठती, गंगा जल ले माथ ||


मंगल भावों का उदय, छाये परमानंद |
शुभ शुभ योगायोग है, विरह अग्नि हो मंद |
विरह अग्नि हो मंद, चंद दिन ही तो बाकी |
महके मधु मकरंद, मस्त महिमा अम्बा की |
मैया का आशीष, ख़त्म हो मन के दंगल |
मिटे विरह की टीस, होय सब मंगल मंगल ||
नाव-यात्रा 
हरी भरी यह उर्वरा, गंगा का वरदान |
प्रभु की भक्ती से भरा, है चौरस मैदान ||

गंगा जी में मिल रहीं, छोटी नदियाँ आय |
यमुना आई दूर से, देख गंग हरषाय ||

सरस्वती भी हैं यहाँ, त्रिवेणी का धाम |
सुन्दर होती आरती, मुग्ध कर रही शाम ||

संगम पहली मर्तवा, देख प्रफुल्लित होय |
करती संध्या वंदना, अपना बदन भिगोय ||

रात यहीं विश्राम कर, सुबह बढ़ाई नाव |
काशी में दर्शन करे, तन-मन भक्ति-भाव ||

बाढ़ी गंगा जी गजब, थी अथाह जलरास |
नाव चलाने में मगर, बड़े कुशल सब  दास ||

 धीरे धीरे हो गया, सरयू संगम पार |
गंगा जी के पाट का, बढ़ा और विस्तार ||

आश्विन में बूंदें पड़े, रात्री बाढ़े शीत |
नाविक आगे बढ़ रहे, गाते मीठे गीत ||

ना जाने कब नींद ने, लिया उन्हें भी घेर |
बालू भित्ती में फंसे,  होने लगी कुबेर ||

दोपहर भी बीती वहां, लागे नाहीं दांव |
हिकमत करके हारते, कैसे निकले नाँव ||

टकराने से खुल गया, महत्वपूर्ण इक जोड़ |
पानी अन्दर घुस रहा, उलचें बाहें मोड़ ||

छेद नाव में होने से भी, कभी नहीं नाविक घबराया    । 
जल-जीवन में गहरे गोते, सदा सफलता सहित लगाया ।
इतना लम्बा अनुभव अपना, नाव किनारे पर आएगी -
इन हाथों पर बड़ा भरोसा, बाधाओं को पार कराया ।।

पीछे से आती दिखी, एक बड़ी सी नाव |
मदद मांगते मित्रवर, तट पर नाव कराव ||

पूछतांछ करते पता, एक कोस पर गाँव |
यथाशीघ्र जाओ वहाँ, कारीगर ले आव ||

इक नाविक के संग में, परम बटुक अगवान |
शांता देती एक पण, लाने को सामान ||

दोनों तेजी से गए, गई घरी इक बीत |
दो ही आते दीखते, बदल गई क्या रीत ||

मानव मानव की करे, मदद सदा हरसाय | 
मीठी बोली पर सखे, माटी मोल बिकाय ||

चले मरम्मत बिन नहीं, आगे मेरी नाव |
शांता बोली नाविकों,  तम्बू चलो लगाव ||

आगंतुक को देखकर, शांता है हैरान |
परम बटुक उनमें नहीं, लगे निकलने प्रान ||

नाविक बोला माँ सुनों, भाई बड़ा महान |
महारुजा से ले बचा, तीन जनों की जान ||

घोर संक्रमण से ग्रसित, हुवे गाँव के लोग |
बदन तपे खुब ज्वर चढ़े, जाने कैसा रोग ||

कारीगर चरणन पड़ा, बचा लेव मम ग्राम |
शांता देकर सांत्वना, बोले भज हरिनाम ||

चार घरी में कर दिया, पूर्ण मरम्मत काम |
हाथ जोड़कर बोलता, रात करें विश्राम ||

अगले दिन प्रात: वहाँ, तट पर आये लोग |
गन्ना गुड़ चूड़ा चढ़ा, चढ़ा रहे सब भोग ||

साध्वी शांता के छुवें, आदर से सब पाँव |
एक वृद्ध से जब सुनी, गाँव सुपरिचित नाँव ||


क्या दालिम को जानते, वही रमण के भाय |
अंगदेश जाकर बसे, महाराज ले जाय ||


जय हो देवी शांता, करय लगे जयकार |
दालिम का ही पूत है, करे वहाँ उपचार ||

और दुपहरी में दिखा, बटुक तनिक घबरात |
शांता को खुश देखकर, फिर थोडा मुस्कात ||

पीड़ा सहकर भी करो, दूजे का कल्याण |
यही चिकित्सक कर्म है, मत जाने दो प्राण ||

बटुक परम ज्यों जानता, यह बाबा का ग्राम |
बड़े बुजुर्गों को करे, छूकर पैर प्रणाम ||

औषधि सबको दी बता, दिया सफाई सीख |
मुखिया को समझा दिया, ग्राम आश्वस्त दीख ||

विदा विदाई हो गई, चली दुबारा नाव |
पाल ठीक से बाँध के, थोड़ी गति बढ़ाव ||

इक पण तुमको था दिया, कहाँ गए तुम भूल |
रमण बिचारा कर रहा, अपनी भूल कुबूल ||

वापस पण करने लगा, शांता दी मुसकाय |
भाई रख ले पास में,  काम समय पर आय ||

बटुक कहे दीदी रखो, मुझे पड़े न काम |
मैं तो हूँ शिक्षार्थी, भिक्षाटन हरिनाम ||

जब नाविक को चढ़ गया, रात्री अतिशय ताप |
जड़ी बटुक की कर गई, कम उसका संताप ||

रिश्तों से रिसता रहे, दंभ स्वार्थ शठ-नीत ।
दोनों मन विश्वास हो, श्रृद्धा प्रेम पुनीत ।

श्रृद्धा प्रेम पुनीत,  बड़ी भंगुरता इनमे ।
लगे कांच जो ठेस, बिखर जाता है छिन  में ।

आये मुश्किल काल, चाल न चलिए भैया ।
हाथ पकड़ हर हाल, चलो तुम चढ़ा घुडैया ।।

पानी  ढोने का  करे,  जो बन्दा  व्यापार  |
मुई प्यास कैसे भला, सकती उसको मार ||
लहरों के संग खेलना, लहरें जीवन देत |
लहरें ही हैं  जिंदगी, यही बैल हल खेत ||


गंगा उत्तरवाहिनी, बना है सुन्दर घाट |
नाव किनारे पर लगा, घूमी शांता हाट ||

परम बटुक करने लगे, राजनीति पर बात |
कितना होना चाहिए, कर का सद-अनुपात ||

उत्तरदायी राज्य-प्रति, या राजा प्रति होय |
मंत्री का क्या कार्य है, कहिये दीदी सोय ||

विधिसम्मत कैसे रहे, होय न्याय का राज |
राज-पुरुष के दोष पर, उठे कहाँ आवाज ||

प्रमुख विराजें ग्राम में, अंकुश का क्या रूप |
जन कल्याणी कार्य के, कैसे होंय स्वरूप ||

लम्बी चर्चा हो रही, विद्वानों की राय |
राज पक्ष प्रस्तुत करे, दीदी दे समझाय ||