Friday, 28 September 2012

सर्ग-4 : भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता परम :

Shanta (Ramayana)

Shanta is a character in the Ramayana. She was the daughter of Dasharatha and Kausalya, adopted by the couple Rompad and Vershini.[1] Shanta was a wife of Rishyasringa.[1] The descendants of Shanta and Rishyasringa are Sengar Rajputs who are called the only Rishivanshi rajputs.

Life

Shanta was a daughter of Maharajah Dasharatha and Kausalya, but was adopted by the king (rajah) of Angadesh, Raja Rompad, and her aunt Vershini, an elder sister of Kausalya. Vershini had no children, and, when at Ayodhya, Vershini jokingly asked for offspring. Dasharatha agreed to allow the adoption of his daughter. However, the word of Raghukul was binding, and Shanta became the princess of Angadesh.
Shanta was educated in Vedas, Art and Craft, and was considered to have been very beautiful. One day, while her uncle, the king Rompad, was busy in conversation with Shanta, a Brahmin came to ask for help in cultivation in the days of the monsoon. Rompad did not pay attention to the Brahmin's plight. This irritated and enraged the Brahmin, who left the kingdom. Indradev, the god of rain, was unable to bear the insult of his devotee, so there was little rainfall during the monsoon season. The Rajah called Rishyasringa to perform yagya, he agreed to perform yagya and during the recitation of it, it rained heavily. The public rejoiced and there were festivals in Angadesh. To pay honour to their saviour, Dashratha, along with Kausalya, Vershini, and Rompad, decided to give the hand of Shanta to Rishyasringa.
As Dashratha had no children after Shanta, he wanted a son to continue his legacy and to enrich his royal dynasty. He called Rishyasringa to perform a putra kameshthi yagya to beget progeny, and as the consequence of the said Yagya were born: Rama, Bharata, and the twins Lakshmana and Shatrughna.[2]

 सर्ग-4
  भाग-1 
  भार्या शांता

कौशिकी-कोसी 
सृन्गेश्वर महादेव

भगिनी विश्वामित्र की, सत्यवती था नाम |
षोडश सुन्दर रूपसी, हुई रिचिक की बाम ||


दुनिया का पहला हुआ, यह बेमेल विवाह |

बुड्ढा खूसट ना करे, पत्नी की परवाह || 


वाणी अति वाचाल थी, हुआ शीघ्र बेकाम |

दो वर्षों में चल बसा, बची अकेली बाम ||


सत्यवती पीछे गई, स्वर्ग-लोक के द्वार |

कोसी बन क्रोधित हुई, होवे हाहाकार ||


उच्च हिमालय से निकल, त्रिविष्टक को पार |

अंगदेश की भूमि तक, है इसका विस्तार ||


असंतुष्ट सी बह रही, नहीं तनिक भी बोध |

जल-प्लावित करती रहे, जब - तब  आवे क्रोध ||


अंगदेश का शोक है, रूप बड़ा विकराल |

ग्राम सैकड़ों लीलती, काल बजावे गाल ||


धरती पर लाती रही, बड़े गाद भण्डार |

गंगा जी में जा मिले, शिव का
कर आभार ||

इसी भूमि पर कर रहे, ऋषि अभिनव प्रयोग |

ऋषि विविन्डक  हैं यही, विनती करते लोग ||


उन्हें पराविज्ञान का, था अद्भुत अभ्यास |

मन्त्रों की शक्ति प्रबल, सफल सकल प्रयास ||



निश्छल  और  विनम्र  है, मंद-मंद मुस्कान |
मितभाषी मृदु-छंद है, उनका हर व्याख्यान ||
अभिव्यक्ति रोचक लगे, जागे मन विश्वास |  
बाल-वृद्ध-युवजन जुड़े, आस छुवे आकाश ||
दूरदर्शिता  का उन्हें,  है अच्छा अभ्यास |
जोखिम से डरते नहीं, नहीं अन्धविश्वास ||

इन्ही विविन्डक  ने दिया, था दशरथ को ज्ञान |
शांता को दे दीजिये, गोद किसी की दान ||



सृंगी ऋषि,  कुल्लू घाटी


ऋषि विविन्ड़क का प्रबल, परम प्रतापी पूत |

कुल्लू घाटी में पड़े, अब भी कई सुबूत ||


जेठ मास में आज भी, सजा पालकी दैव |

करते इनकी वंदना, सारे वैष्णव शैव ||


लकड़ी का मंदिर बना, कलयुग के महराज |

 कल के सृंगी ही बने, देव-स्कर्नी आज ||

अट्ठारह करदू हुवे, उनमे से हैं एक |

कुल्लू घाटी विचरते, यात्रा करें अनेक ||


हमता डौरा-लांब्ती, रक्ती-सर गढ़-धोल |

डौरा कोठी पञ्च है, मालाना तक डोल ||


छ सौ तक हैं पालकी, कहते हैं रथ लोग |

सृंगी से आकर मिलें, सूखे का जब योग ||


मंत्रो पर अद्भुत पकड़, करके वर्षों शोध |


वैज्ञानिक अति श्रेष्ठ ये, मिला पिता से बोध ||
File:Water inside shringi rishi cave.JPG
गुफा में पानी -नाहन 
नाहन के ही पास है, गुफा एक सिरमौर |
जप-तप करते शोध इत, जब सूखे के दौर ||


सृन्गेश्वर की थापना, कम कोसी का कोप |

सृंगी के हाथों हुआ, बढ़ता जनमन चोप || 
 
 सात पोखरों की धरा, सातोखर है नाम |
शोध कार्य होते यहाँ, पुत्र-काम का धाम || 

अंगदेश का क्षेत्र यह, दुनिया भर में नाम | 
 
आठ वर्ष के बाद फिर, शांता करे प्रणाम  ||

धुंधली धुंधली सी दिखे, बचपन की तस्वीर ।
रूपा की शैतानियाँ, शीश-सृंग की पीर ।। 

शांता और रिस्य-सृंग 
शांता थी गमगीन, खोकर काका को भली |
मौका मिला हसीन, लौटी चेहरे पर हंसी ||

सबने की तारीफ़, वीर रमण के दाँव की  | 
सहा बड़ी तकलीफ, मगर बचाई जान सब ||

राजा रानी आय, हालचाल लेकर गए |
करके सफल उपाय, वैद्य ठीक करते उसे ||

हुआ रमण का व्याह, नई नवेली दुल्हनी |
पूरी होती चाह, महल एक सुन्दर मिला ||

नीति-नियम से युक्त, जिये  जिन्दगी धीर धर |
हंसे  ठठा उन्मुक्त, परहितकारी कर्म शुभ || 

रहते दोनों भाय, माता बच्चे साथ में |
खुशियाँ पूरी छाय, पाले जग की परंपरा ||

मनसा रहा बनाय, रमण एक सप्ताह से |
सृन्गेश्वर को जाय, खोजे रहबर साधु को ||

शांता जानी बात, रूपा संग तैयार हो |
माँ को नहीं सुहात, कौला  सौजा भी चलीं ||

दो रथ में सब बैठ, घोड़े भी संग में चले |
रही  शांता  ऐंठ, मेला  पूरा जो लगा ||

रही सोम को देख, चंपा बेटे से मिलीं |
मूंछों  की आरेख, बेटे की  लागे भली ||

बेटा  भी तैयार, महादेव के दर्श हित |
होता अश्व सवार, धीरे से निकले सभी ||

 नौकर-चाकर भेज, आगे आगे जा रहे |
 इंतजाम में तेज, सभी जरूरत पूरते ||

पहुंचे संध्या काल, सृन्गेश्वर को नमन कर |
डेरा देते डाल, अगले दिन दर्शन करें ||

सुबह-सुबह अस्नान,  सप्त-पोखरों में करें |
पूजक का सम्मान, पहला शांता को मिला ||

कमर बांध तलवार, बटुक परम भी था खड़ा |

सन्यासी को देखते, लगा इन्हें हुस्कारने ||

रूपा शांता संग, गप्पें सीढ़ी पर करे |
हुई देखकर दंग, रिस्य सृंग को सामने ||

तरुण ऊर्जा-स्रोत्र, वल्कल शोभित हो रहा |
अग्नि जले ज्यों होत्र, पावन समिधा सी हुई ||

गई शांता झेंप, चितवन चंचल फिर चढ़ी |
मस्तक चन्दन लेप, शीतलता महसूस की ||

ऋषिवर को परनाम, रूपा बोली हृदय से |
शांता इनका नाम, राजकुमारी अंग की ||

हाथ जोड़कर ठाढ़, हुई शांता फिर मगन |
वैचारिक यह बाढ़, वापस भागी शिविर में ||

पूजा लम्बी होय, रानी चंपा की इधर |
शिव को रही भिगोय, दुग्ध चढ़ाये विल्व पत्र ||

रमण रहे थे खोज, मिले नहीं वे साधु जी |
था दुपहर में भोज, विविन्डक आये  शिविर ||

गया चरण में लोट, रमण देखते ही उन्हें |
मिटते उसके खोट, जैसे घूमें स्वर्ग में ||

बोला सबने ॐ, भोजन की पंगत सजी |
बैठा साथे सोम, विविन्डक ऋषिराज के ||

संध्या  सारे जाँय, कोसी की पूजा करें |
शांता रही घुमाय, रूपा को ले साथ में ||

अति सुन्दर उद्यान, रंग-विरंगे पुष्प हैं |
सृंगी से अनजान, चर्चा करने लग पड़ीं ||
तरह तरह के प्रेम हैं, अपना अपना राग |
मन का कोमल भाव है, जैसे जाये जाग |
जैसे जाये जाग, वस्तु वस्तुता नदारद |
पर बाकी सहभाग, पार कर जाए सरहद |
जड़ चेतन अवलोक, कहीं आलौकिक पावें |
लुटा रहे अविराम, लूट जैसे मन भावे |
 
लगते राजकुमार, सन्यासी बन कर रहें ||
करके देख विचार, दाढ़ी लगती है बुरी ||

खट-पट करे खिडांव, देख सामने हैं खड़े |
छोड़-छाड़ वह ठाँव, रूपा सरपट भागती ||

शांता शान्ति छोड़, असमंजस में जा पड़ी |
जिभ्या चुप्पी तोड़, करती है प्रणाम फिर ||

मैं सृंगी हूँ जान, ऋषी राज के पुत्र को |
करता अनुसंधान, गुणसूत्रों के योग पर ||

मन्त्रों का व्यवहार, जगह जगह बदला करे |
सब वेदों का सार, पुस्तक में संग्रह करूँ ||

पिता बड़े विद्वान, मिले विरासत में मुझे |
उनके अनुसंधान, जिम्मेदारी है बड़ी ||

कर शरीर का ख्याल, अगर सवारूँ रात दिन |
पूरे  कौन  सवाल, दुनिया के फिर करेगा ||

बदले दृष्टिकोण, रिस्य सृंग का प्रवचन |
बाहें रही मरोड़, हाथ जोड़ प्रणाम कर ||

लौटी रूपा देख, बढे सृंग आश्रम गए | 
अपनी जीवन रेख, शांता देखे ध्यान से ||

लौट शिविर में आय, अपने बिस्तर पर पड़ी |
कर कोशिश विसराय, सृंगी मुख भूले नहीं ||  
सर्ग-4
भाग-2 
शांता का सन्देश 

सृन्गेश्वर से आय के, हुई जरा चैतन्य |
छोड़ विषय को शांता, लगी सोचने अन्य ||


रिश्तों   की   पूंजी  बड़ी , हर-पल संयम वर्त |  
पूर्ण-वृत्त   पेटक  रहे ,  असली  सुख   संवर्त ||

सोम हुवे युवराज जब, उसको आया ख्याल ||
बिना पुत्र के है बुरा, अवध राज का हाल ||

गुरु वशिष्ठ को भेजती, अपना इक सन्देश |
तीव्रगति से पहुँचता, शांता  दूत  विशेष ||

रिस्य सृंग के शोध का, था  उसमें उल्लेख | 
गुरु वशिष्ठ हर्षित हुए, विषयवस्तु को देख ||

चितित दशरथ को बुला, बोले गुरू वशिष्ठ ||
हर्षित दशरथ कर रहे, कार्य सभी निर्दिष्ट ||

तैयारी पूरी हुई, रथ को रहे उड़ाय  |
रिस्य सृंग के सामने, झोली दें फैलाय ||

हमको ऋषिवर दीजिये, अब अपना आशीष |
चरणों में हैं लोटते,  धरके अपना शीश ||

राजन धीरज धारिये, काहे होत अधीर |
सृन्गेश्वर को पूजिये, वही हरेंगे पीर ||

मैं तो साधक मात्र हूँ, शंकर ही हैं सिद्ध |
दोनों हाथों से पकड़, बोले उठिए वृद्ध ||

सात दिनों तक आपकी, करूँगा पूरी जाँच |
सृन्गेश्वर के सामने, शिव पुराण नित बाँच ||

सात दिनों का तप प्रबल, औषधिमय खाद्यान |
दशरथ पाते पुष्टता, मिटे सभी व्यवधान ||

सूची इक लम्बी लिखी,  सृंगी देते सौंप ||
बुड्ढी काया में दिखी, तरुणों जैसी चौप ||

कुछ प्रायोगिक कार्य हैं, कोसी की भी बाढ़ |
इंतजाम करके रखो,  आऊं माह असाढ़||

ख़ुशी-ख़ुशी दशरथ गए, रौनक रही बताय | 
देरी के कारण उधर, रानी सब उकताय ||

अवधपुरी के पूर्व में, आठ कोस पर एक |
बहुत बड़े भू-खंड पर, लागे लोग अनेक ||

सुन्दर मठ-मंदिर बना, पोखर बना विशेष |
हवन कुंड भी सज रहा, पहुंचा सारा देश ||

थी अषाढ़ की पूर्णिमा, पुत्र-काम का यग्य |
सुमिर गजानन को करें, रिस्य सृंग से विज्ञ ||

शांता भी आई वहां, रही व्यवस्था देख |
फुर्सत में थी बाँचती, सृंगी के अभिलेख ||

 समझे न जब भाष्य को, बिषय तनिक गंभीर |
फुर्सत मिलते ही मिलें, सृंगी सरयू तीर ||


देखें जब अभ्यासरत, रिस्य रिसर्चर रोज |

नए-नए सिद्धांत को, प्रेषित करते खोज ||


प्रेम प्रस्फुटित कब हुआ, जाने न रिस्य सृंग |
वहीँ किनारे भटकता, प्रेम-पुष्प पर भृंग ||

कई दिनों तक यग्य में, रहे व्यस्त सब लोग |
नए चन्द्र दर्शन हुए, आया फिर संयोग ||

पूर्णाहुति के बाद में, अग्नि देवता आय |
दशरथ के शुभ हाथ में, रहे खीर पकडाय ||

दशरथ ग्रहण कर रहे, कहें बहुत आभार |
आसमान में देवता, करते जय जयकार ||

कौशल्या करती ग्रहण, आधी पावन खीर |
कैकेयी भी ले रही, होकर बड़ी अधीर ||

दोनों रानी ने दिया, आधा आधा भाग |
रहा सुमित्रा से उन्हें, अमिय प्रेम अनुराग ||

चैत्र शुक्ल नवमी तिथी, प्रगट हुवे श्री राम |
रही दुपहरी खुब भली, तनिक शीत का घाम ||

गोत्र दोष को काटते, रिस्य सृंग के मन्त्र |
कौशल्या सुदृढ़ करे, अपना रक्षा तंत्र ||

कैकेयी के भरत भे, हुई मंथरा मग्न |
हुवे सुमित्रा के युगल,लखन और शत्रुघ्न ||

लंका में रावण उधर, जीत विश्व बरबंड |
मानव को जोड़े नहीं, बाढ़ा बहुत घमंड ||


देव यक्ष गन्धर्व को, जीता हुआ मदांध |
 स्वर्ग जीत के टाँगता, यम को उल्टा बाँध ||

नर-वानर बूझे नहीं, माने कीट पतंग | 
अनदेखी करने लगा, करे विश्व बदरंग ||

अंग अंग लेकर विकल, गई शांता अंग |
और इधर रिस्य सृंग की, शोध कर रही भंग ||
  सर्ग-4 
भाग-3
कौशल्या कन्या पाठशाला 


अंगराज के स्वास्थ्य को, ढीला-ढाला पाय |
चम्पारानी की ख़ुशी, सारी गई बिलाय ||

शिक्षा पूरी कर चुके, अपने राजकुमार |
अस्त्र-शस्त्र सब शास्त्र में, पाया ज्ञान अपार ||

नीति-रीति सब विधि कुशल, वय अट्ठारह साल |
राजा बोले सोम से, पद युवराज सँभाल ||

हामी भरते ही हुआ, जयकारा चहुँओर ।
निश्चित तिथि पर जमा हो, सबसे बड़ी बटोर ।

शांता आगे बढ़ करे, सारे मंगल कार्य |
बटुक परम करता मदद, सेवे वह आचार्य ||

तीन दिनों तक महल में, चहल पहल का दौर ।
हर्षित राजा रोमपद, हुवे सोम सिरमौर ।।

गुरुजन के सानिध्य में, हुआ बटुक को बोध |
दीदी से कहने लगा, दूर करें अवरोध ||

प्रारम्भिक शिक्षा हुई, थी शांता के संग |
समुचित शिक्षा के बिना, मानव रहे अपंग ||

सुनकर के अच्छा लगा,  देती आशिर्वाद  |
सृन्गेश्वर भेजूं  तुझे, चार दिनों के बाद ||

आया उसको ख्याल शुभ, रखी बाँध के गाँठ |
कन्याशाला से बढ़ें, अंगदेश  के ठाठ ||

सोम बने युवराज तो, आया श्रावण मास |
सूत्र बाँधती भ्रात को, बहनों का दिन ख़ास ||

आई श्रावण पूर्णिमा,  सूत्र बटुक को बाँध |
गई सोम को बाँधने, मन में निश्चित साँध ||
राज महल में यह प्रथम,  रक्षा बंधन पर्व |
सोम बने युवराज हैं, होय बहन को गर्व ||

चम्पारानी थी खड़ी, ले आँखों में प्यार |
शांता अपने भ्रातृ की, आरति रही उतार ||

रक्षाबंधन बाँध के, शांता बोली भाय |
मोती-माणिक राखिये, यह सब नहीं सुहाय ||

दीदी खातिर क्या करूँ, पूँछें जब युवराज |
कन्या-शाला दीजिये, सिद्ध कीजिये काज ||

बोले यह संभव नहीं, यह शिक्षा बेकार |
पढ़कर कन्या क्या करे, पाले-पोसे नार ||

कन्याएं बेकार में,  समय करेंगी व्यर्थ  ||
गृह कार्य सिखलाइये, शिक्षा का क्या अर्थ ||

माता ने झटपट किया, उनमे बीचबचाव  |
शिक्षित नारी से सधे, देश नगर घर गाँव ||

वेदों के विपरीत है, नारी शिक्षा बोल |
उद्दत होते सोम्पद, शालाएं मत खोल ||

बढ़िया घटिया पर बहस, बढ़िया जाए हार |
घटिया पहने हार को, छाती रहा उभार |
छाती रहा उभार, दूर की लाया कौड़ी  |
करे सटीक प्रहार, दलीले भौड़ी भौड़ी |
तर्कशास्त्र की जीत, हारता मूर्ख गड़रिया |
बढ़िया बढ़िया किन्तु, तर्क से हारे बढ़िया ||

 
बोली, मैंने भी पढ़ी, शांता कर प्रतिवाद |
वेद-भाष्य रिस्य सृंग का, कोई नहीं विवाद ||

गौशाला को हम चले,  बाकी काम अनेक |
श्रावण बीता जाय पर, मेघ दिखे नहिं एक ||

त्राहि-त्राहि परजा करे, आया अंग अकाल |
खेत धान के सूखते, ठाढ़े कई सवाल ||

भीषण गर्मी से थका, मन-चंचल तन-तेज |
भीग पसीने से रही, मानसून अब भेज |

मानसून अब भेज, धरा धारे जल-धारा |
जीव-जंतु अकुलान, सरस कर सहज सहारा |

पद के सुन्दर भाव, दिखाओ प्रभु जी नरमी |
यह तीखी सी धूप, थामिए भीषण गरमी ||
धीरे धीरे सावन आये। समय हमेशा अधिक लगाये ।
व्याकुल जीवन तपती धरती । नाजुक विटप लताएँ मरती ।।
कुदरत अब सिंगार करे है । मस्तक पर नव मुकुट धरे है ।
नव पल्लव संबल पाते हैं । लिपट चिपट कर चढ़ जाते हैं ।।
हरियाली सब का मन मोहे ।  रविकर दिनभर भटके-टोहे ।
मेघ गर्जना बिजली दमकी । कविवर क्यूँ आँखें न चमकी ??

गौशाला में आ रहा, बेबस गोधन खूब |
पानी जो बरसा नहीं, जाए जन मन ऊब ||
सूखे के आसार हैं, बही नहीं जलधार ।
हैं अषाढ़ सावन गए, कर भादौं उपकार ।।



मन का पंछी दूर तक, उड़ उड़ वापस आय ।
सावन भी भाये नहीं, मन दारुण तड़पाय ।
  मन दारुण तड़पाय, स्वाँस यादे ही लाती ।
सुन गोरी चितलाय, झूल सावन जो गाती ।
भीगे भीगे शब्द, करे हैं ठेलिमठेला ।
रहा अधर में झूल, भीगता नहीं अकेला ।।

दूर दूर से आ रहे, गंगाजी के तीर ||
देखों उनकी दुर्दशा, करत घाव गंभीर ||

छोड़े अपने बैल सब, गाय देत गौशाल |
जोहर पोखर सूखते, बाढ़ा बड़ा बवाल ||
गरज हमारी देख के,  गरज-गरज घन खूब ।
बिन बरसे वापस हुवे, धमा-चौकड़ी ऊब ।
धमा-चौकड़ी ऊब, खेत-खलिहान तपे हैं ।
तपते सड़क मकान, जीव भगवान् जपे है ।
त्राहिमाम हे राम, पसीना छूटे भारी ।
भीगे ना अरमान, भीगती देह हमारी ।। 

सब शिविरों में आ रहे, होता खाली कोष |
कन्या शाला के लिए, मत दे बहना दोष ||

इतने में दालिम दिखा, बोला जय युवराज |
मंत्री-परिषद् बैठती, कुछ आवश्यक काज ||

पढ़ चेहरे के भाव को, दालिम समझा बात ||
शांता बिटिया है दुखी, दुखी दीखती मात ||

दालिम से कहने लगी, परम बटुक की चाह |
पढने की इच्छा प्रबल, दीजे तनिक सलाह ||

जोड़-घटाना जानता, जाने वह इतिहास |
वह भी तो सेवक बने, मात-पिता जब दास ||

लगी कलेजे में यही,  उतरी गहरे जाय |
सोचें न उत्कर्ष की, शांता कस समझाय ||

दुखते दिल से पूछती, अच्छा कहिये तात |
राजमहल के चार कक्ष, इधर कहाँ इफरात ||

चम्पा-रानी भी कहें, हाँ दालिम हाँ बोल |
कन्या-शाला को सके, जिसमें बिटिया खोल ||

हाथ जोड़ करके कहे,  यहाँ नहीं अस्थान |
महल हमारा है बड़ा, मिला हमें जो दान ||

शांता उछली जोर से, हर्षित निकले चीख |
कन्या-शाला के लिए, मांगे शांता भीख ||

शर्मिंदा क्यूँ कर रहीं, हमको ख़ुशी अपार |
ठीक-ठाक करके रखूं, कल मैं कमरे चार ||

माता को लेकर मिली, गई पिता के कक्ष |
अपनी इच्छा को रखा, सुनी राजसी पक्ष ||

सैद्धांतिक सहमति मिली, सौ पण का अनुदान |
कौशल्या शाळा खुली, हो नारी उत्थान ||

दूर दूर के कारवाँ, उनके संग परिवार ||
रूपा शांता संग में,  करने गई प्रचार ||

रुढ़िवादियों ने वहाँ, पूरा किया विरोध |
कई प्रेम से मिल रहे, कई दिखाते क्रोध ||

घर में खाने को नहीं, भटक रहे हो तीर |
जाने कब दुर्भिक्ष में, छोड़े जान शरीर || 

नौ तक की कन्या यहाँ, छोडो मेरे पास |
भोज कराउंगी उन्हें,  पूरे ग्यारह मास ||

इंद्र-देवता जब करें, खुश हो के बरसात |
 तब कन्या ले जाइए, मान लीजिये बात ||

गृहस्वामी सब एक से, जोड़-गाँठ में दक्ष |
मिले आर्थिक लाभ तो, समझें सम्मुख पक्ष ||


धरम-भीरु होते कई, कई देखते स्वार्थ |

जर जमीन जोरू सकल,इच्छित मिलें पदार्थ ||


चतुर सयानी ये सखी, मीठा मीठा बोल |
तेरह कन्यायें जमा, देती शाला खोल ||

एक कक्ष में दरी थी, उस पर चादर डाल |
तेरह बिस्तर की जगह, पंद्रह की तैयार ||

कक्ष दूसरा बन गया, फिर भोजन भंडार |
कार्यालय तीजा बना, कक्षा बनता चार ||

जिम्मेदारी भोज की, कौला रही उठाय |
सौजा दादी बन गई, बच्चों की प्रिय धाय ||

शांता पहली शिक्षिका, रूपा का सहयोग |
तख्ती खड़िया बँट गई,जमा हुवे कुछ लोग ||

रानी माँ आकर करें, शाळा शुभ-आरम्भ |
आड़े पर आता रहा, कुछ पुरुषों का दम्भ ||

 
जिम्मेदारी का वहन, करती बहन सटीक |
मौके पर मिलती खड़ी, बेटी सबसे नीक |
बेटी सबसे नीक, पिता की गुड़िया रानी |
चले पकड़ के लीक, बेटियां बड़ी सयानी |
रविकर का आशीष, बेटियाँ बढ़ें हमारी |
मातु-पिता जा चेत, समझ निज जिम्मेदारी ||

 

नित्य कर्म करवा रहीं, सौजा रूपा साथ |
आई रमणी रमण की, लगा रही खुद हाथ ||

पहले दिन की प्रार्थना, सादर शारद केर |
एकदन्त की विनय से, कटते बाधा-फेर ||

 


उबटन से ऊबी नहीं, मन में नहीं उमंग ।
पहरे है परिधान नव, सजा अंग-प्रत्यंग ।
सजा अंग-प्रत्यंग , नहाना केश बनाना ।
काजल टीका तिलक, इत्र मेंहदी रचवाना ।
मिस्सी खाना पान, महावर में ही जूझी ।
करना निज उत्थान, बात अब तक ना बूझी ।।

स्वस्थ बदन ही सह सके, सांसारिक सब भार |

बुद्धी भी निर्मल रहे, बढ़े सकल परिवार ||

रूपा के व्यायाम से, बच्चे थक के चूर ||
शुद्ध दूध मिलता उन्हें, घुघनी भी भरपूर ||

पहली कक्षा में करें, बच्चे कुछ अभ्यास ||
गोला रोटी सा करे, रेखा जैसे बांस || 

रिश्ते रिसियाते रहे, हिरदय हाट बिकाय ।
परिचित बेगाने हुए, ख़ुशी हेतु भरमाय ।
ख़ुशी हेतु भरमाय, नहीं अंतर-मन देखा।
धर्म कर्म व्यवसाय, बदल ब्रह्मा का लेखा ।
  दीदी का उपदेश, सरल सा चलो समझते ।
दिल में रखे सहेज, कीमती पावन रिश्ते ।।
 

एक घरी अभ्यास कर, गिनती सीखे जांय ||
दस तक की गिनती गिनें, रूपा रही बताय ||

 

सृजन-शीलता दे जला, तन-मन के खलु व्याधि ।
बुरे बुराई दूर हों, आधि होय झट आधि ।।


सृंगी के अभिलेख से, सीखी थी इक बात |

पारेन्द्रिय अभ्यास से, हुई स्वयं निष्णात ||

दोपहर में छुट्टी हुई, पंगत सभी लगाय |
हाथ-पैर मुंह धोय के, दाल-भात सब खाय ||

एक एक केला मिला, करते सब विश्राम |
कार्यालय में आय के, करे शांता काम ||

खेलों की सूची दिया, रूपा को समझाय |
दो घंटे का खेल हो, संध्या इन्हें जगाय ||

गौशाला से दूध का, भरके पात्र  मंगाय |
संध्या में कर वंदना, रोटी खीर जिमाय ||

सौजा दादी से कही,  एक कहानी रोज |
बच्चों को बतलाइये, रखिये दिन में खोज || 


किलकारी में हैं छुपे, जीवन के सब रंग ।

सबसे अच्छा समय वो, जो बच्चों के संग ।
जो बच्चों के संग, खिलाएं पोता पोती ।
दीपक प्रति अनुराग, प्यार से ताकें ज्योती ।
दीदी दादी होय, दीखती दमकी दृष्टी ।
ईश्वर का आभार, गोद में खेले सृष्टी ।  
 

राज-महल में शांता, बैठी ध्यान लगाय |
पावन मन्त्रों को जपे, दूरानुभूति आय ||

 
तिनका मुँह में दाब के, मुँह में उनका नाम ।
सौ जोजन का सफ़र कर, पहुंचाती पैगाम ।
पहुंचाती पैगाम, प्रेम में पागल प्यासी ।
सावन की ये बूंद, बढाए प्यास उदासी ।
पंछी यह चैतन्य, किन्तु तन को न ताके ।
यह दारुण पर्जन्य, सताते जब तब आके ।।
 

सृंगी के मस्तिष्क की, मिलती इन्हें तरंग ||
वार्ता होने लग पड़ी, रोमांचित हर अंग ||

सादर कर परनाम फिर, पूछी सब कुशलात ||
अंगदेश के बोलती, अपने सब हालात |

मिलता जब आशीष तो, जाय नेह में डूब |
बटुक परम भेजूं वहाँ, पढना चाहे खूब ||

स्वीकार करते ऋषी, करती ये अनुरोध |
एक शिक्षिका भेजिए, देवे  कन्या-बोध ||

माता खट-खट कर रहीं, ये बातों में लीन |
टूटा जो संपर्क तो,तड़पी जैसे  मीन ||

 
इक अति छोटे शब्द पर, बड़े बड़े विद्वान ।
युगों युगों से कर रहे, टीका व व्याख्यान ।

टीका व व्याख्यान,  सृष्टि को देती जीवन ।

न्योछावर मन प्राण, सँवारे जिसका बचपन ।
हो जाता वो दूर,  सभी सिक्के हों खोटे ।
कितनी वो मजबूर, कलेजा टोटे टोटे ।।

दालिम को जाकर मिली, अगले दिन समझाय |

परम बटुक गुरुकुल चले, हर्षित पढने जाय ||

वय है चौदह वर्ष की, पढने में था तेज |
आगे शिक्षा के लिए, रही शांता भेज ||

 
प्रीति होय न भय बिना, दंड बिना ना नीति ।
शिक्षा मिले न गुरु बिना, सद्गुण बिना प्रतीति ।

 

इक हफ्ते में आ गई, माँ का लेकर रूप |
नई शिक्षिका करे सब, शाळा के अनुरूप ||


सर्ग-4
भाग-4 
अंग-देश में अकाल     

  बिटिया वेद पुराण में, रही पूर्णत: दक्ष |
शिल्प-कला में भी निपुण, मंत्री के समकक्ष ||


उपवन में बैठी करें, राजा संग विचार |

अंगदेश की किस तरह, महिमा बढ़े अपार ||


चर्चा में दोनों हुए, पूर्णतया तल्लीन |

प्रजा रहे सुख शान्ति से, धरती कष्ट विहीन ||


अंग भूमि से दूर हो, असुरों का संत्रास |

दूर भूख भय से रहे, करने उचित प्रयास ||


इसी बीच पहुँचे हुवे, पहुँचे विप्र महान |

 अपने आश्रम के लिए, लेने कृषि सामान ||


अनदेखी राजा करे, क्रोधित कहते साधु | 

घोर उपेक्षा तू करे, है अक्षम्य अपराधु ||


हरे-भरे इस राज्य में, होगी नहिं बरसात |

शापित करके चल पड़े, किया जबर आघात ||


जाते देखा विप्र को, दूर हुआ अज्ञान |

क्षमा क्षमा भूपति कहें, जूँ  रेंगे
नहिं कान ||

भादों की बरसात भी, ठेंगा गई दिखाय |
बूंद बूंद को तरसती, धरती फट फट जाय ||

झाड़ हुए झंखाड़ सब, बची पेड़ की ठूठ |
कृषक बिचारा क्या करे, छूटी हल की मूठ ||

खाने को लाले पड़े, कंठ सूखते जाँय |
खिचड़ी दोने में बटे, गंगा माय सहाय ||

जीव जंतु अकुला रहे, तड़पें छोड़ें प्राण |
त्राहि-त्राहि त्रासक त्रिशुच, त्रायमाण त्रुटि त्राण ||

अंगदेश की अति-कठिन, कड़ी परीक्षा होय |
 नगर सेठ मंत्री सभी, रहे काम में खोय ||

शाला में हर दिन बढ़ें, कन्याएं दो-चार |
चार कक्ष करने पड़े, जल्दी में तैयार ||

शांता ने अपना दिया, सारा कोष लुटाय |
सन्यासिन सी बन रहे, कन्या रही पढ़ाय ||
 
दुःख की घड़ियाँ गिन रहे, घडी-घडी सरकाय ।
धीरज हिम्मत बुद्धि से, जाएगा विसराय ।
जाएगा विसराय, लगें सर-सरिता गोते ।
लो मन को बहलाय, धीर सज्जन नहिं खोते ।
 शाश्वत चलता चक्र, घूम लाये दिन बढ़िया ।
होना मत कमजोर, गिनों कुछ दुख की घड़ियाँ ।।

भीषण गर्मी से हुई, कुछ बाला बीमार |
औषधि बांटे वैद्य जी, रूपा शांता प्यार ||

मिट्टी की पट्टी करे, जहाँ रोग उपचार |
शुभ दीदी का शुद्ध चित्त, ठीक करे बीमार |
ठीक करे बीमार, स्वयं भी रहे निरोगी |
उदाहरण ना अन्य, मिलें ना ऐसे योगी |
बड़े भयंकर रोग, जहाँ गुम सिट्टी-पिट्टी |
जाय व्यवस्था हार, वहाँ धरती की मिट्टी ||

कौला हर दिन शाम को, कहती कथा बुझाय |
तरह तरह के स्वांग से, रहती मन बहलाय ||
 
संसाधन सा जानिये, संयुत कुल परिवार |
गाढ़े में ठाढ़े मिलें, बिना लिए आभार |
बिना लिए आभार, कृपा की करते वृष्टी |
दादा दादी देव, दुआ दे दुर्लभ दृष्टी |
सच्चे रिश्ते मुफ्त, हमेशा है अपनापन  |
संग सकल परिवार, जुटाए सौ संसाधन |

कभी कभी बादल घिरें, गरजे खुब चिग्घाड़ |
बरसें दूजे देश में, जाँय कलेजा फाड़ ||
करता हैं जो पुन्य-कर्म, संस्कार आभार ।
 तपे जेठ दोपहर की, मचता हाहाकार ।
मचता हाहाकार, पेड़-पौधे कुम्हलाये ।
जीव जंतु जब हार, बिना जल प्राण गँवाए ।

हे मानव तू धन्य , कटोरी जल की भरता  ।
दो मुट्ठी भर कनक , दया खग-कुल पर करता ।।

अनुष्ठान जप तप करें, पर ईश्वर प्रतिकूल |
ऊपर उड़ते गिद्ध-गण, नीचे उड़ती धूल ||

धीरे धीरे कम हुआ, सूरज का संताप |
मार्गशीर्ष की शीत से, रहे लोग अब काँप ||

कैकय का गेंहूँ वणिक,  बेचें ऊंचे दाम |
अवधराज बँटवा रहे, खुद से धान तमाम ||
१)
अत्याधिक हुशियार हैं, दुनिया मूर्ख दिखाय।
जोड़-तोड़ से हर जगह, लेते जगह बनाय ।।
२)
सचमुच में हुशियार हैं, हित पहलें ले साध ।
 कर्म वचन में धार है , बढ़ते  रहें अबाध ।।
 ३)
 इक बन्दा सामान्य है, साधे जीवन मूल ।
 कुल समाज भू देश हित, साधे सरल उसूल ।
४)
इस श्रेणी रविकर पड़ा, महामूर्ख अनजान ।
दुनियादारी से विलग, माने चतुर सयान ।। 

अंगदेश पर जो पड़ी, यह दुर्भिक्षी मार |
आगामी गर्मी भला, कैसे होगी पार ??
 अंतर-मन से बतकही, होती रहती मौन ।
सिंहावलोकन कर सके, हो अतीत न गौण ।

हो अतीत न गौण, जांच करते नित रहिये ।

चले सदा सद्मार्ग, निरंतर बढ़ते रहिये ।
परखो हर बदलाव,  मुहब्बत  अपनेपन से ।
रहे अबाध बहाव, प्रेम-सर अंतर्मन से |

लोग पलायन कर रहे, राजा हैं मजबूर |
बड़े मनीषी हैं जमा, सृन्गेश्वर में दूर ||

किया आकलन काल का, ढूंढा सहज उपाय |
रिस्य सृंग का ब्याह शुभ, शांता से हो जाय ||

लेकर इस सन्देश को, परम बटुक हैं जात |
साधू दुल्हा सोच के, माँ चम्पा अकुलात ||

शाला आये सोम्पद, रूपा से टकरात |
सुन्दरता ऐसी लगी, जैसे हो अभिजात ||


नथुनी संग सुनार के, करती नित गुणगान ।
सुन्दर काया जो दिया,  भूली वो नादान ।
भूली वो नादान, नाक नथुनी का अन्तर । 
लागे भला सुनार,  याद न करती ईश्वर ।
अगर कटे यह नाक, करेगी क्या तू अगुनी  ।
प्रकट करो आभार, रखे प्रभु नकुना नथुनी ।।


कार्यालय में जा जमे, दीदी पहुंची जाय |
विषम परिस्थिति पर वहां, वे दोनों बतलाय ||

सावन में भी न हुई, अब तक इक बरसात |
दीदी की आज्ञा मिले, आये तभी बरात ||

भाई मेरी शर्त दो, पूरी करिए आप |
मुझको न एतराज है, मिटे विकट संताप ||

शाळा का इक भवन हो, मिले बड़ा अनुदान |
संरक्षक बन कर रहें, हो सबका कल्याण ||

तन मन धन जीवन करूँ, दीदी तेरे नाम |
शर्त दूसरी भी कहो, निपटाने हैं काम ||

रूपा लेकर आ गई, पानी के दो पात्र |
चेहरे पर थी विद्वता, थी शांता की छात्र ||

सिलवट पर पिसता रहा, याद वाद रस प्रेम ।
 ऐ लोढ़े तू रूठ के,  भाँड़ रहा है नेम ।
 भाँड़ रहा है नेम, स्नेह शाश्वत नहिं छूटे ।
वासर ज्यूँ अखरोट, नहीं तेरे बिन फूटे ।
पाता था नित चैन, लुढ़क जो बदले करवट ।
बिन तेरे दिन रैन, तड़पता रहता सिलवट ।।

शांता बोली फिर कभी, रख दूंगी यह बात |
आगे काम बढ़ाइए, हो जाये बरसात ||
 
 बंधन काटे ना कटे, कट जाए दिन-रैन ।
विकट निराशा से भरे, निकले दीदी बैन ।

निकले दीदी बैन, चैन मन को नहिं आये  ।
न्योछावर सर्वस्व,  बड़ी बगिया महकाए ।
फूलों को अवलोक, लोक में खुशबू  चन्दन ।
नारी मत कर शोक, मान ले मैया बंधन ।।   

शांता बाहर ज्यों गई, पड़ी सोम की दृष्ट |
 मित्रों ने सच ही कहा, रूपा है उत्कृष्ट ||

कैसी शाळा चल रही, कितने  कक्षा वर्ग |
रूपा की बोली मधुर, बतलाई हर सर्ग ||

जाते हैं युवराज तो,  उनको करे प्रणाम |
निपटाने रूपा लगी, एक-एक फिर काम ||

बटुक परम के पास जा, शांता पूछे हाल |
आश्रम में रखते सभी, उसका बेहद ख्याल ||

गुरुवर दीदी के लिए, भेजे यह रुद्राक्ष |
रूपा सुनके यह खबर, करती व्यंग-कटाक्ष ||

हँसी हँसी में कह गई, बातें रूपा गूढ़ | 
शांता खोई याद में, लगे पुरनिया-बूढ़ ||

संदेशा भेजें अवध, अवधि हो रही पार |

मात-पिता निश्चित करें, शुभ-विवाह का वार ||

परम बटुक के साथ में, गए सोम युवराज |
बिबिंडक के शरण में, होंय सिद्ध सब काज ||

लग्न-पत्रिका सौंपते, कर पूजा अरदास |
सादर आमंत्रित करें, उल्लेखित दिन ख़ास ||

परम बटुक मिलने गया, रिस्य सृंग के कक्ष |

किया दंडवत प्रेम से, रखे अंग का पक्ष ||  



गुरुवर की होवे कृपा, मिले मार्ग-निर्देश  |
शंकर के दर्शन सुलभ, चढ़ने में क्या क्लेश ??
चढ़ने में क्या क्लेश, सीड़ियाँ चढ़ते जाएँ ।
जय जय जय गुरुदेव, खटाख़ट बढ़ते जाएँ ।
बुद्धू पंगु-गंवार, भक्त भोला भा रविकर ।
सर-सरिता गिरि-खोह, कहाँ बाधा हैं गुरुवर ।।
 


गुरुवर ! दीदी भेजती, यह इक मुट्ठी धान |
मूक रहीं थी उस समय, अधरों पर मुस्कान ||

लेकर दोनों हाथ से, कहते माथ लगाय  |
सुन्दर क्यारी साजिए, रक्खूँ  पौध बनाय ||

सर्ग-4
भाग-5 
वार्षिक-उत्सव
स्त्री-शिक्षा पर लिखा,  सृंगी का इक लेख |
परेंद्रीय संज्ञान से, रही शांता देख ||


चाहे तारे तोड़ना, नहीं दीखती राह ।
रख दे चौकी पद तले, दे हौसला सलाह ।।

धयान-मग्न होकर करे, सृंगी से वह बात |

  पर-निर्भरता नारि की, करे सदा ही घात ||

नव महिने में जो भरे, मानव तन में प्राण |
ग्यारह में क्यों न करे, अपना नव-निर्माण ||

मेहनत अपनी जाँचिये, कह सृंगी समझाय |
कन्याओं को देखिये, झट उत्तर मिल जाय ||

व्यय पूरा कैसे पड़े, सबकुछ तो प्रतिकूल |
शांता हुई विचारमग्न, सच्चे सरल उसूल ||

सावन में पूरे  हुए,  पहले ग्यारह मास |
बालाओं के लिए थे, ये अलबेले ख़ास ||

कन्याएं साक्षर हुईं, लिख लेती निज नाम |
फल-फूलों के चित्र से, खेलें वे अविराम ||

ग्यारह महिने में पढ़ीं दो वर्षों का पाठ |
तीन पांच भी बूझती, बारह पंजे साठ ||

करने में सक्षम हुईं, अपने जोड़ -घटाव  |
दिन बीते कुल तीन सौ, पाई नया पड़ाव ||

आई श्रावण पूर्णिमा, राखी हैं तैयार |
सूत कात के रुई से, ताक रही हैं द्वार ||

मात-पिता के साथ में, भाई कुल दो-चार |
सब कन्याएं लें मना,  राखी का त्योहार ||

स्नेह-सूत्र को बाँध के, बालाएं अकुलायं |
बापू उनको फिर कहीं, वापस न ले जाँय ||

दो कन्याएं रो रहीं, मिला नहीं परिवार |
कैसे हैं माता-पिता, कैसे गए विसार ||

पता किया जब हाल तो, मिला दुखद सन्देश |
दक्षिण दिश को थे गए, असुरों के परदेश || 



आंसू आंशुक-जल सरिस, हरे व्यथा तन व्याधि ।
समय समय पर निकलते,  आधा करते *आधि । |


वक्त वक्त की बात है, बढ़िया था वह दौर |
समय बदलता जा रहा, कुछ बदलेगा और |

कुछ बदलेगा और, आग से राख हुई जो |
पानी धूप बयार, प्यार से तनिक छुई जो  |

मिट जायेगा दर्द, सर्द सी सिसकारी में |
ढक जाएगा गर्द, और फिर लाचारी में |


शांता अब देने लगी, उनपर वेशी ध्यान |

कैसे भी पूरे करूँ, इनके सब अरमान ||

अपने गहने भी किये, इस शाळा को भेंट |
दो कपड़ों में रह रही, खुद को पुन: समेट ||
  
 
बारह बाला घर गईं, थी जो दस से पार |
कर के सब की वंदना, देकर के उपहार  ||

नीति नियम रक्खी बना, दस तक शिक्षा देत |
कथा जुबानी सिखा के, प्रति अधिकार सचेत ||

दस की बाला को सिखा,  निज शरीर के भेद |
साफ़ सफाई अहम् है, काया स्वच्छ सुफेद ||

वाणी मीठी हो सदा, हरदम रहे सचेत |
चंडी बन कर मारती, दुर्जन-राक्षस प्रेत ||

बाखूबी वह जानती, सद-स्नेहिल स्पर्श |
गन्दी नजरें भापती, भूले न आदर्श ||

सालाना जलसा हुआ, आये अंग-नरेश |
प्रस्तुतियां सुन्दर करें, भाँति-भाँति धर भेस ||

इक नाटक में था दिखा, निपटें कस दुर्भिक्ष |
तालाबों की महत्ता, रोप-रोप के वृक्ष ||

जब अकाल को झेलता, अपना सारा देश |
कालाबाजारी विकट, पहुंचाती है ठेस ||

बर्बादी खाद्यान  की, लो इकदम से रोक  | 
जल को अमृत जानिये, कन्या कहे श्लोक ||

गुरुकुल के आचार्य का, प्रस्तुत है उदबोध ||
नारी शिक्षा पर रखें, अपने शाश्वत शोध ||

दस शिक्षक के तुल्य है, इक आचार्य महान |
सौ आचार्यों से बड़ा, पिता तुम्हारा जान ||

  सदा हजारों गुना है, इक माता
का ज्ञान |
  शिक्षा शाश्वत सर्वथा,
सर्वोत्तम वरदान ||

गार्गी मैत्रेयी सरिस, आचार्या कहलांय |
गुरु पत्नी आचार्यिनी, कही सदा ही जाँय ||

कात्यायन  की वर्तिका,  में सीधा उल्लेख |
महिला लिखती व्याकरण, श्रेष्ठ प्रभावी लेख ||

महिला शिक्षा पर करे, जो भी खड़े सवाल |
पतंजलि को देखिये, आग्रह-पूर्व निकाल ||


शांता जी ने है किया, बड़ा अनोखा कार्य |
देता खुब आशीष हूँ, मै उनका आचार्य ||

भेजूंगा कल पाठ्यक्रम, पांच साल का ज्ञान |
तीन वर्ष में ये करें, कन्या गुण की खान ||

अब राजा अनुदान को, चार गुना कर जाँय |
शांता सन्यासिन बनी, जीवन रही बिताय ||

शाळा की चिंता लिए, दूरानिभूति साध |
सृंगी से करने लगी, चर्चा परम अगाध ||

 
त्याग प्रेम बलिदान की, नारी सच प्रतिमूर्ति ।
दफनाती सारे सपन, सरल समस्या-पूर्ति ।
सरल समस्या-पूर्ति , पाल पति-पुत्र-पुत्रियाँ ।
आश्रित कुल परिवार, चलाती कुशल स्त्रियाँ ।
निभा रही दायित्व, किन्तु अधिकार घटे हैं ।
  हरते जो अधिकार, पुरुष वे बड़े लटे हैं ।।


विस्तृत चर्चा हो गई, एक पाख ही हाथ |
छूटेगा सचमुच सकल, कन्याओं का साथ ||

 करे व्यवस्था रोज ही, सुदृढ़ अति मजबूत |
सृन्गेश्वर की शिक्षिका, पाती शक्ति अकूत ||

आचार्या प्रधान बन, लेत व्यवस्था हाथ |
सौजा कौला साथ में, रूपा का भी साथ ||

आत्रेयी ब्रह्म-वादिनी, करे अग्नि शुभ होत्र |
बालाओं की बन रही, संस्कार की स्रोत्र ||

साध्यवधू शांता करे,  सृन्गेश्वर  का ध्यान |
सखियों के सहयोग से, कार्य हुए आसान ||

आशंका चिंता-भँवर, असमंजस में लोग ।
चिंतामणि की चाह में, गवाँ रहे संजोग । 
 गवाँ रहे संजोग, ढोंग छोडो ये सारे ।
मठ महंत दरवेश, खोजते मारे मारे ।
एक चिरंतन सत्य, फूंक चिंता की लंका ।
हँसों निरन्तर मस्त, रखो न मन आशंका ।।