Wednesday, 14 June 2017

सर्ग-5
अंतिम भाग 
पञ्च-रत्न 
शादी होती सोम से, शांता का आभार |
कौला दालिम खुश हुए, पाती रूपा प्यार ||

चाहत की कीमत मिली, अहा हाय हतभाग ।
इक चितवन देती चुका, तड़पूं अब दिन रात । 

परम बटुक को मिल रहा, राजवैद्य का नेह |
साधक आयुर्वेद का, करता अर्पित देह ||
  
कौशल्या उत्सुक बड़ी, कन्याशाला घूम |
मन को हर्षित कर गई, बालाओं की धूम || 

गोदी की इक बालिका, आकर करे कमाल | 
संस्कारित शिक्षित करे, दो सौ ललना पाल || 

हर बाला इक वंश है, फूले-फले विशाल | 
होवे देवी मालिनी,  हरी भरी हर डाल || 

पैरों पर होना खड़े, सीखो सखी जरुर ।
आये जब आपात तो,  होना मत मजबूर ।

शाळा को नियमित मिले, सौ पण का अनुदान | 
कौशल्या कहकर चली, बिटिया बड़ी महान || 

राम-लखन के साथ में, शांता समय बिताय |
दूल्हा-दुल्हन की डगर, हक़ से छेके जाय ||

स्वर्णाभूषण त्याग दी,  आडम्बर सब त्याग |
भौतिकता से  है  नहीं,  दीदी  को  अनुराग ||

दीदी बोली कीजिये, शर्त दूसरी पूर |
शाळा हरदिन जायगी, रूपा सखी जरूर ||

जिम्मेदारी दीजिये, खींचों नहीं लकीर  |
शक्ति नारि में है बड़ी, बदल सके तक़दीर ||

कन्याएं दो सौ वहां, अभिभावक दो एक |
शाला की चिंता हरे, रूपा मेरी नेक ||

बना व्यवस्था चल पड़ी, वह शाळा की ओर |
आत्रेयी को सौंपती, पञ्च-रत्न की डोर ||

आचार्या करने लगी, प्रश्न-पत्र तैयार |
कई चरण की जाँच से, होना होगा पार ||

नियत समय पर आ रहे, लेकर सब उम्मीद |
कन्याशाला में टिके,  पढ़ उद्धृत-ताकीद ||

पहला दिन आराम का, हुई न कोई जाँच |
नगर भ्रमण कोई करे, कोई पुस्तक बाँच ||

कोई बैठा बाग़ में, कोई गंगा तीर |
खेल करे मैदान में, कई सयाने वीर ||

मिताहार कोई वहां, मिताचार से प्यार |
कुछ तो भोजन भट्ट हैं, और कई लठमार ||

सूची इक जारी हुई, बाइस वापस जाँय |
 इक्कावन अब देह की, रहे जाँच करवाय  ||

तेरह इसमें छट गए, अड़तिस गंगा तीर |
डूबी पानी में उधर, ग्यारह की तकदीर ||

सत्ताइस की लेखनी, बाइस हों उत्तीर्ण |
पाँच जनों के हो रहे, ऐसे भाग-विदीर्ण ||

राज महल में मिल गया, सबको एकल कक्ष |
अपने अपने विषय में, थे ये पूरे दक्ष ||

बाइस पहले जो छटे, शाला के प्रति द्वेष |
शिक्षा के प्रति रूचि नहीं, उनमें रही विशेष ||

राजकाज के काम दो, दिए एक से जाँय |
तीन दिनों में एक को, आना है निपटाय ||

प्रतिवेदन प्रस्तुत करो, लिखकर वापस आय |
एक परीक्षा फिर  बचे, तेरह  को  बिलगाय ||

गुप्तचरों की सूचना, वा प्रस्तुत आलेख |
चुने महामंत्री सजग, प्रतिभागी नौ  देख ||

अगले दिन दरबार में, बैठे अंग नरेश |
नौ के नौ आयें वहां, धर दरबारी भेष ||

साहस संयम शिष्टता, अनुकम्पा औदार्य |
मितव्ययी निर्बोधता, न्याय-पूर्ण सद्कार्य ||

क्षमाशीलता सादगी, सहिष्णुता गंभीर |
सच्चाई प्रफुल्लता, निष्कपटी मन धीर ||

स्वस्ति बुद्धि हो शुद्धता, हो चारित्रिक ऐक्य |
दानशील आस्तिक सभी, अग्र-विचारी शैक्य ||

सर्वगुणी सब विधि भले, सब के सब उत्कृष्ट |
अंगदेश को गर्व है, गर्व करे यह सृष्ट ||

जाँच-परखकर कर रहे, सबको यहाँ नियुक्त |
एक वर्ष के बाद में, होंय चार जन मुक्त ||

तीन मास बीते यहाँ, आया फिर वैशाख |
शांता सृन्गेश्वर चली, मन में धीरज राख ||

कन्याओं से मिल लिया, पुष्पा-पुत्तुल पास |
रमणी को देकर चली, एक हिदायत ख़ास ||

 बटुक रमण फिर से चला, दीदी को ले साथ |
शिक्षा विधिवत फिर करे, जय हो भोले नाथ || 

आश्रम की रौनक बढ़ी, सास-ससुर खुश होंय |
सृंगी अपने शोध में, रहते  हरदम खोय ||

शांता सेवा में जुटी, परम्परा निर्वाह |
करे रसोईं चौकसी, भोजन की परवाह ||

शिष्य सभी भोजन करें, पावें नित मिष्ठान |
करें परिश्रम वर्ग में, नित-प्रति बाढ़े ज्ञान ||

वर्षा-ऋतु में पूजती, कोसी को धर ध्यान |
सृन्गेश्वर की कृपा से, उपजे बढ़िया धान ||

शांता की बदली इधर, पहले वाली चाल |
धीरे धीरे पग धरे, चलती बड़ा संभाल ||

खान-पान में हो रहा, थोडा सा बदलाव |
खट्टी चीजें भा रहीं,  बदल गए अब चाव ||

सासू माँ रहने लगीं, चीजें सभी सहेज ||
समय चक्र चलने लगा, अबतो किंचित  तेज || 

पुत्री सुन्दर जन्मती, बाजे आश्रम थाल |
जच्चा बच्चा की रखे, मैया सदा सँभाल ||

तीन वर्ष पूरे हुए, शिक्षा पूरी होय |
दीदी से मिलकर चले, बटुक अंग फिर रोय || 

फिर पूरे परिवार से, करके नेक सलाह |
माँ दादी को साथ ले, पकड़ें घर की राह || 

आश्रम इक सुन्दर बना, करते हैं उपचार |
साधुवाद है वैद्य जी, बहुत बहुत आभार ||

तीन वर्ष बीते इधर, मिला राज सन्देश |
वैद्यराज का रिक्त पद, तेरे लिए विशेष ||

क्षमा-प्रार्थना कर बचे, नहीं छोड़ते ग्राम |
आश्रम फिर चलता रहा, प्रेम सहित अविराम ||

रक्षाबंधन पर मिली, शांता घर पर आय |
भागिनेय दो गोद में, दीदी रही खेलाय ||

पुत्तुल के संग वो रखी, पाणिग्रहण प्रस्ताव |
मेरी सहमति है सदा, पुत्तुल की बतलाव ||

लिया बटुक को साथ में, चम्पानगरी जाय |
पुत्तुल के इनकार पर, रही उसे समझाय ||

नश्वर जीवन कर दिया, इस शाळा के नाम |
बस नारी उत्थान हित, करना मुझको काम ||

पुष्पा से एकांत में, मिलती शांता जाय |
वैद्य बटुक से व्याह हित, मांगी उसकी राय ||

शरमाई बाहर भगी, मिला मूल संकेत |
मंदिर में शादी हुई, घरवाला अनिकेत ||

रूपा से मिलकर हुई, दीदी बड़ी प्रसन्न |
गोदी में इक खेलता, दूजा है आसन्न ||

पञ्च रत्न की सब कथा, पूछी फिर चितलाय |
डरकर नकली असुर से, भाग चार जन जाँय ||

पञ्च-रतन को एक दिन, दे अभिमंत्रित धान |  
खेती करने को कहा, देकर पञ्च-स्थान || 

बढ़िया उत्पादन हुआ, मन सा निर्मल भात | 
खाने में स्वादिष्टतम, हुआ न कोई घात || 

राज काज मिल देखते, पंचरत्न सह सोम | 
महासचिव का साथ है, कुछ भी नहीं विलोम  || 

पिताश्री ने एक दिन, सबको लिया बुलाय | 
पंचरत्न में चाहिए, स्वामिभक्त अधिकाय || 

चाटुकारिता से बचो, इंगित करिए भूल | 
राजधर्म का है यही, सबसे बड़ा उसूल || 

औरन की फुल्ली लखैं , आपन  ढेंढर  नाय
ऐसे   मानुष   ढेर  हैं,   चलिए  सदा  बराय|| 

निर्बुद्धि की जिन्दगी, सुख-दुःख से अन्जान |
निर्बाधित जीवन जिए,  बिना किसी व्यवधान  ||

श्रमिक बुद्धिवादी बड़ा,  पाले  घर  परिवार |
मूंछे  ऐठें  रुवाब से,  बैठे  पैर  पसार  ||

बुद्धिजीवियों का  बड़ा, है रोचक अन्दाज |
जिभ्या ही करती रहे, राज काज आवाज ||

बुद्धियोगियों का  हृदय,  लेकर  चले समाज |
करे जगत का वह भला, दुर्लभ हैं पर आज ||

लेकर सेवा भावना, देखो भाग विभाग | 
पैदा करने में लगो, जनमन में अनुराग ||

मात-पिता से पूछ के, कुशल क्षेम हालात |
वहां सही संतुष्टि पा, शांता वापस जात ||

कुशल व्यवस्थापक बनी, हुई भगवती माय | 
पाली नौ - नौ  पुत्रियाँ,  आठो  पुत्र पढाय || 

बने एक से एक से, संतति सब गुणवान | 
शोध भाष्य करते रहे, पढ़ते वेद - पुरान || 

वैज्ञानिक वे श्रेष्ठ सब, मन्त्रों पर अधिकार | 
अपने अपने ढंग से, सुखी करें संसार || 

सास-ससुर सब सौंप के, गए देव अस्थान |
राजकाज सब साध के, देकर के वरदान ||

वन खंडेश्वर को गए, महाराज ऋषिराज  |
आश्रम साजे भिंड का, करे वहां प्रभु-काज ||

आठ पौत्रों से मिले, सब है बेद-प्रवीन |
बड़े भिंड के हो गए, आश्रम में आसीन ||

सौंपें सारे ज्ञान को, बाबा बड़े महान |
स्वर्ग-लोक जाकर बसे, छोड़ा यह अस्थान ||

भिन्डी ऋषि के रूप में, हुए विश्व विख्यात |
सात राज्य में जा बसे, पौत्र बचे जो सात || 

एक अवध में जा बसे, सरयू तट के पास |
बरुआ सागर आ गया, एक पुत्र को रास ||

विदिशा जाकर बस गए, सबसे छोटे पूत |
पुष्कर की शोभा बढ़ी, बाढ़ा वंश अकूत ||

आगे जाकर यह हुए, छत्तीस कुल सिंगार |
छ-न्याती भाई यहाँ, अतुलनीय विस्तार ||

बसे हिमालय तलहटी, चौरासी सद्ग्राम | 
वंशज सृंगी के यहाँ, रहते हैं अविराम ||

सृंगी दक्षिण में गए, पर्वत बना निवास |
ज्ञान बाँट करते रहे, रही शांता पास ||

वंश-बेल बढती रही, तरह तरह के रूप | 
कहीं मनीषी बन रमे, हुए कहीं के भूप || 

मंत्र-शक्ति अतिशय प्रबल, तंत्रों पर अधिकार | 
कलियुग के प्रारब्ध तक, करे वंश व्यवहार || 

हुए परीक्षित जब भ्रमित, कलियुग का संत्रास | 
स्वर्ण-मुकुट में जा घुसा, करे बुद्धि का नाश  || 

सरिता तट पर एक दिन, लौटे कर आखेट | 
लोमस ऋषि से हो गई, भूपति की जब भेंट || 

बैठे रहे समाधि में,  राजा समझा धूर्त | 
मरा सर्प डाला गले, जैसे शंकर मूर्त || 

वंशज देखें सृंग के, भर अँजुरी में नीर | 
मन्त्रों से लिखते भये, सात दिनों की पीर || 

यही सर्प काटे तुम्हें, दिन गिनिये अब सात | 
गिरे राजसी कर्म से, सहो मृत्यु आघात || 

मन्त्रों की इस शक्ति का, था राजा को भान | 
लोमस के पैरों पड़ा, वह राजा नादान || 

लेकिन भगवत-पाठ सुन, त्यागा राजा प्रान | 
यह पावन चर्चित कथा, जाने सकल जहान || 

मत्तगयन्द सवैया  

संभव संतति संभृत संप्रिय, शंभु-सती सकती सतसंगा ।
संभव वर्षण  कर्षण कर्षक, होय अकाल पढ़ो मन-चंगा । 
पूर्ण कथा कर कोंछन डार, कुटुम्बन फूल फले सत-रंगा ।
स्नेह समर्पित खीर करो, कुल कष्ट हरे बहिना हर अंगा ।।

जय जय भगवती शांता परम 


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